सोरों। दो दिन पूर्व पाकिस्तानी सीमा से देश में घुसे आतंकवादियों से लोहा लेते हुए भारतीय सेना के तीन जवानों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। आम जनता कहती है कि आखिर कब तक हमारे जवानों को शहादत देनी होगी, यह सवाल हर भारतीय के लिए चिंता का विषय बन चुका है। आखिर कब तक हमारे बहादुर सैनिक नेताओं की कथित असफल राजनैतिक कूटनीति का शिकार बनते रहेंगे। पाक 1971 के युद्ध में भारी पराजय के बाद से निरंतर भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़े हुए। हमारे हजारों वीर सैनिक अपने अनमोल प्राणों का मातृभूमि की रक्षा के लिए बलिदान कर चुके हैं। अब लोग अमेरिका की तरह कार्रवाई चाह रहे हैं।
डा.राधाकृष्ण दीक्षित का कहना है कि खुफिया एजेंसियां निरंतर पाकिस्तान सीमा में आतंकी प्रशिक्षण शिविर संचालित होने की सूचनाएं दे रही हैं। भारत द्वारा विरोध दर्ज कराने के बावजूद वहॉ की सरकार आतंकी शिविरों को बंद करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही। ऐसे में क्रिके ट, द्विपक्षीय व्यापार, आवागमन के लिए बस सेवा आदि को बढावा देने की केंद्र सरकार की नीति कतई ठीक नहीं है। अब देश को भी जैसे को तैसा की तर्ज पर पाकिस्तान को अस्थिर करने में अपनी ऊर्जा खर्च करनी चाहिए।
शिक्षक आशीष पुंढीर का कहना है कि सरकार को पाकिस्तान के साथ क्रिकेट संबंध किसी भी कीमत पर शुरू नहीं करने चाहिए। पूर्व में भी दर्शक के रूप में पाकिस्तान से आए कट्टरपंथी वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी स्वदेश नहीं लौटे। भारत में ही छद्म नाम से रहकर विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त हो गए, उन्हें ढूंढ कर देश से निकाला जाए।
व्यवसायी अरविंद अग्रवाल का कहना है कि पाकिस्तान की नियत पाक नहीं है। भारत को अब उसी तरह पाकिस्तान में घुसकर आतंकी शिविरों पर ड्रोन हमले करने चाहिए, जिस तरह अमेरिका ने पाकिस्तान के एटबाबाद में घुसकर ओसामा को मार गिराया और पाकिस्तान को कानों कान खबर भी न हुई।
भाजयुमो नेता बृजेश उपाध्याय का कहना है कि हमारे वीर सिपाही मानवता के दुश्मन अजमल कसाब को जिंदा पकड़ लेते हैं, लेकिन दुख की बात है केंद्र सरकार ऐसे देशद्रोही आतंकी को अब तक फांसी पर न लटका पाई। जिससे सीमा पार बैठे आतंकी आकाओं के हौसले बुलंद हैं।