कानपुर चिड़ियाघर के आसपास की इमारतों के शोर की वजह वन्य जीव तनाव में हैं। निर्माणाधीन इमारतों के फ्लैट में मशीनें चलती रहती हैं। इससे घरघराहट भरा शोर चिड़ियाघर में भी सुनाई पड़ता है। इसकी वजह से जानवरों की खुराक घट रही है।
तनाव बढ़ने से जानवर चिड़चिड़े हो गए हैं। जरा सी बात पर उग्र हो जाते हैं। उनका निद्रा चक्र भी गड़बड़ हो रहा है। चिड़ियाघर प्रशासन ने ध्वनि प्रदूषण से निपटने के लिए और अधिक पौधे लगाने की योजना बनाई है।
चिड़ियाघर का शांत परिसर सुबह से ही आसपास की इमारतों से आने वाले शोर से भरने लगता है। इमारतों में फ्लोर और दूसरे काम के लिए मशीनों का इस्तेमाल होता है। इससे तनाव बढ़ाने वाली आवाज आती रहती है।
इसके अलावा आबादी होने से यहां किसी कार्यक्रम में माइक का इस्तेमाल होने से भी तेज आवाज चिड़ियाघर में गूंजा करती है। इससे जानवर तनाव में रहते हैं। शेर, टाइगर, हिरन, पक्षी सब ध्वनि प्रदूषण से प्रभावित हो रहे हैं। ये दिन में ढंग से खाना नहीं खाते, उनकी खुराक घट गई है। इसके अलावा रात में शोर होने से उनका निद्रा चक्र गड़बड़ हो रहा है।
चिड़ियाघर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. आरके सिंह ने कहा कि घरघराहट की आवाज से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का वन्य जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। चिड़ियाघर के निदेशक केके सिंह ने बताया कि इसका हल निकालने की कोशिश की जा रही है। चिड़ियाघर में और पौधे लगाए जाएंगे। पेड़-पौधे ध्वनि प्रदूषण को घटाते हैं।
मोहन तेंदुए की हालत नाजुक
चिड़ियाघर के बीमार मोहन तेंदुए की हालत और खराब होती जा रही है। मोहन ने खाना पीना कम कर दिया है। वह मुश्किल से पाव भर चिकन ही खा पा रहा है। सामान्य स्थिति में एक दिन में तेंदुआ तीन-चार किलो चिकन खाता है।
मोहन का उपचार चिड़ियाघर के अस्पताल में चल रहा है। उसे बराबर ग्लूकोज चढ़ाया जा रहा है। उसे न्यूरो सिस्टम की बीमारी है जिससे स्पाइनल कॉर्ड प्रभावित है। वह आवाज देने पर भी कम रिस्पांस दे रहा है। नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी से हिलने-डुलने में तकलीफ हो रही है।