एक निजी अस्पताल में दी थी थैरेपी
घरवाले उन्हें लेकर डॉक्टरों के यहां भागते रहे, पर आराम नहीं मिला। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के विजिटिंग प्रोफेसर स्टेम सेल थैरेपी के विशेषज्ञ डॉ. बीएस राजपूत ने बताया कि कमलेश अवस्थी को शहर के एक निजी अस्पताल में उन्होंने थैरेपी दी थी।
वीडियो क्लिप भेजकर अपनी स्थिति बताई
32 साल पुराने केस में पहली बार थैरेपी दी है। 10 दिन पहले रोगी को उन्होंने फॉलोअप में भी देखा। अब रोगी ने वीडियो क्लिप भेजकर अपनी स्थिति बताई है। उन्होंने बताया कि स्पाइनल कॉर्ड के ऐसे रोगी का पांच साल के बाद विशेषज्ञ हाथ खड़े कर देते हैं। वजह यह है कि परिणाम अच्छा नहीं आता।
मेडिकल साहित्य के लिए दुर्लभ केस, अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में भेजेंगे
यह केस मेडिकल साहित्य के लिए नया है। इसे दुर्लभ केस रिपोर्ट करने वाले अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल में भी भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि रोगी को स्टेम सेल थैरेपी का एक ही सेशन हुआ है। उसमें ही इतना फायदा हुआ। इसके बाद दूसरा सेशन दिया जाएगा। स्टेम सेल अगर इतने पुराने मामले में काम कर गई, तो इसका फायदा बहुत ऐसे रोगियों को मिलेगा, जो पक्षाघात के कारण बिस्तर पर पड़े जिंदगी गुजार रहे हैं और उम्मीद खो चुके हैं।
प्राचार्य डॉ. संजय काला ने कोहनी की स्टेम सेल थेरेपी कराई
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने भी मंगलवार को स्टेम सेल थैरेपी से अपना इलाज कराया। उन्हें टेनिस एल्बो की दिक्कत रही। डॉ. काला ने बताया कि यह दिक्कत लेप्रोस्कोपी विधि से सर्जरी करने वाले सर्जन को अक्सर हो जाती है। इसे पेशे का खतरा कहा जाता है।
सर्जन को हो जाती टेनिस एल्बो की तकलीफ
इसमें कोहनी की हड्डी में जुड़ने वाली मांसपेशियों में बहुत तेज दर्द होता है। डॉ. बीएस राजपूत ने उन्हें थैरेपी दी। डॉ. काला ने इसके पहले घुटने में स्टेम सेल थैरेपी ली थी। उन्होंने बताया कि छह महीने पहले थैरेपी ली थी। इससे बहुत फायदा हुआ। दर्द में बहुत राहत मिली थी।