कानपुर में हुआ पहला विधानसभा उप चुनाव फीका रहा। जिस हिसाब से राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां की थीं, उस हिसाब मतदाता बूथ तक वोट देने नहीं आए। इसकी एक बड़ी वजह पार्टियों ने लोकल मुद्दों को तवज्जो नहीं दिया। सड़कों के गड्ढों को लेकर ना भाजपा ने बात की ना ही दूसरी पार्टियों ने।
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विधानसभा उप चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
दूसरी वजह यह भी बताई जा रही है कि मुख्य सड़कों पर चुनाव प्रचार तो खूब हुए गलियों में, मोहल्लों के भीतर जिस तरह से प्रचार होने चाहिए थे, नहीं हुए। यही वजह है कि सोमवार को मतदान के दिन कई क्षेत्रों जैसे मसवानपुर, रतनलाल नगर, रावतपुर रामलला मंदिर के आसपास, शास्त्री नगर सहित अधिकांश क्षेत्रों में लोग छतों से चुनाव का माहौल तो देखते रहे लेकिन वोट डालने नहीं पहुंचे।
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भारतीय जनता पार्टी ने मतदाताओं को घर से निकालने के लिए बाकायदा बूथ और मंडलवार टीमें गठित कर रखी थीं। यहां तक कि मतदाताओं को लाने और ले जाने के लिए ई रिक्शा का भी इंतजाम किया गया था। इसके बावजूद बूथों पर मतदाताओं की संख्या नाम मात्र की रही।
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सुबह सात बजे से शुरू हुए मतदान के प्रतिशत का हर घंटे आने वाला रुझान बढ़ने के बजाए तीन बजे तक घटता रहा। इसे लेकर सभी पार्टियों में हलचल रही। खासकर भाजपा के स्थानीय पदाधिकारियों के पास लखनऊ पार्टी मुख्यालय से भी फोन आते रहे।
चुनाव की ड्यूटी में लगाए गए विधायकों और दूसरे वरिष्ठ पदाधिकारियों ने तो मतदाताओं को बुलाने के लिए ड्यूटी पर लगाए गए कार्यकर्ताओं के मोबाइल भी चेक किए। सभी पार्टियों ने अपने-अपने केंद्रीय कार्यालय में कुछ कार्यकर्ता मतदाताओं को लगातार फोन करने के लिए बैठाए गए थे।