कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर फर्जी नियुक्त पर टीसी और पार्सल पोर्टर की ट्रेनिंग कर रहे 16 युवक पिछले दस दिनों से यहां तैनात थे। पकड़े गए ठगों के एजेंट दिनेश कुमार, पवन गुप्ता और शिव नारायण त्रिपाठी यात्रियों का टिकट भी चेक करते थे। उनसे अवैध वसूली भी की जाती थी। सेंट्रल पर इतना सब हो रहा था रेलवे के अफसर, जीआरपी, आरपीएफ आंख मूंदे रहे।
संभव है कि रेलवे के किसी अफसर के इशारे पर इन्हें यहां ट्रेनिंग कराई जा रही थी, जिसकी टोह लेने शुक्रवार को रेलवे विजिलेंस की टीम कानपुर सेंट्रल पहुंची। पार्सल अनुभाग जाकर संबंधित अफसरों से पूछताछ भी की गई। विजिलेंस इंस्पेक्टर संतोष पांडेय की अगुवाई में तीन सदस्यीय टीम सुबह ही पूरे मामले की टोह लेने आ गई थी। इसमें इस गैंग के रेलवे से जुड़े तार भी खंगाले जा रहे हैं।
जब रेलवे जैसी इतनी तकनीकी वाले विभाग में लोग विभाग और पदों का नाम नहीं जानते, रिजर्वेशन कराने, कैंसिल कराने में सौ बार पूछते हैं, ऐसे में इतना बड़ा खेल बिना किसी रेलवे के विभागीय कर्मचारी-अधिकारी से जुड़े होने से नामुमकिन माना जा रहा है। सरगना के पकड़े जाने पर यह कनेक्शन भी खुलेगा।
साथ ही युवकों को जो ज्वाइनिंग लेटर दिया गया था, वह पूर्वोत्तर रेलवे यानी नॉर्थ ईस्ट रेलवे का था। जबकि यह लोग उत्तर मध्य रेलवे के प्रयागराज मंडल के अधीन आने वाले कानपुर सेंट्रल पर ट्रेनिंग कर रहे थे। नौ-10 दिन से वह रात की ड्यूटी कर रहे थे। इन्हें एक लेटर भारत सरकार के रेल मंत्रालय के रेल भर्ती बोर्ड का और दूसरा नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे का मिला था।
भरोसा था ट्रेनिंग सेंट्रल पर पूरी होगी, तभी लेंगे आधी रकम
ठगों का 13 युवकों से 1.15 करोड़ रुपये का सौदा हुआ था। ट्रेनिंग तक सभी से आधा पैसा ले लिया गया था और ट्रेनिंग पूरी होने के बाद बचा पैसा लिया जाना था। ठगों को भरोसा था कि फर्जी नियुक्ति के आधार पर सेंट्रल स्टेशन पर इनकी ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी। इन्होंने ने दो जून से ट्रेनिंग शुरू की थी जो दो अगस्त को पूरी करनी थी। इसके बाद स्थायी नौकरी का फर्जी लेटर थमाया जाता और तय हुआ था कि बकाया रकम तब ली जाएगी। इससे फंसे हुए युवकों को कोई शक भी नहीं हुआ था।
1.15 करोड़ का सौदा हुआ था 13 युवकों से
छह युवकों का सौदा 15-15 लाख रुपये में, चार का दो-दो लाख रुपये में और दो का छह-छह लाख रुपये में सौदा हुआ था। जबकि पार्सल में पोर्टर पद पर तैनाती के नाम पर एक से पांच लाख रुपये तय हुआ था। सौदे की रकम के हिसाब से आधी रकम एजेंटों के माध्यम से सरगना तक पहुंच गई थी। ट्रेनिंग के बाद पूरा पैसा देना था।
एक एजेंट गया जेल, दो आज जाएंगे
तीन एजेंटों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करने के बाद एक आरोपी दिनेश कुमार को शुक्रवार को जेल भेज दिया गया। पवन गुप्ता उर्फ रौनक और शिवनारायण त्रिपाठी उर्फ राहुल को शनिवार को कोर्ट में पेश कर जेल भेजा जाएगा। पहला मुकदमा टिकट निरीक्षण सुनील पासवान की तहरीर पर दिनेश कुमार पर दर्ज किया गया था। इस वजह से उसे शुक्रवार को जेल भेजना जरूरी था।
बाकी दो अन्य एजेंटों की रिपोर्ट दाखिल की जा चुकी है। नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी करने वाले मुख्य सरगना रुद्र प्रताप ठाकुर समेत पांच आरोपी फरार हैं, जिनकी गिरफ्तारी के लिए टीमें बनाई गई हैं। जीआरपी की तफ्तीश में सरगना के दो अन्य साथियों के नाम आए हैं। दिनेश पहले उत्तराखंड के सचिवालय में संविदा पर कंप्यूटर ऑपरेटर की नौकरी करता था। इसका संपर्क रुद्र प्रताप से हुआ, जिसके बाद यह इनसे जुड़ गया।
पीड़ित बनाए गए गवाह
13 युवकों में छह की ओर से गैंग के खिलाफ तहरीर लेकर मुकदमा दर्ज किया गया। सात युवकों को इस मुकदमे में गवाह बनाया गया है। इन्हें भुक्तभोगी मानते हुए जीआरपी ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न कर छोड़ दिया है। इस मामले में वह वादी के तौर पर काम करेंगे। युवकों पैसे ट्रांसफर करने के साक्ष्य भी दिए हैं।
150 रुपये में ज्वाइनिंग लेटर और आईकार्ड
पकड़े गए तीन एजेंटों से पूछताछ में पता चला कि 150 रुपये में एक युवक को नौकरी का पूरा दस्तावेज मिल जाता था। मसलन (आईकार्ड) और नियुक्ति पत्र और रेलवे के जोन लिखी डोरी समेत स्कैन और कलर फोटोकॉपी का खर्च इतना ही होता था। स्टेशन रोड पर ही एक दुकान से लैमिनेशन कराया था। प्लास्टिक के आईडी कार्ड, स्कैन किया नियुक्ति पत्र और एनसीआर छपी नीले या लाल रंग की डोरी 40-40 रुपये मिल गई थी।
जीआरपी सीओ कमरुल हसन खां ने बताया कि पूछताछ में अभिषेक पांडेय और मोहित के नाम भी सामने आए हैं। अभिषेक लंबे समय से नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी का धंधा चला रहा है। पकड़े गए युवकों में अंकुर ने रुड़की के प्रापर्टी डीलर राकेश भट्ट के कहने पर अभिषेक को चार लाख रुपये ट्रांसफर किए थे। मोहित इनके लिए एजेंट के तौर पर काम करता है।