उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि ऋषि परंपरा ही आधुनिक युग में तरक्की का रास्ता है। इसी के दम पर भारत पूरे विश्व में जल, थल, नभ और अंतरिक्ष में तरक्की की छलांग लगा रहा है। जिस देश के लोग भटके, वह कठिनाई में हैं, संकट से उबारने के लिए वह सब आशा भरी निगाह से भारत की ओर ही निहार रहे हैं। भारत के वसुधैव कुटुंबकम का दुनिया लोहा मानती है।
उपराष्ट्रपति ने शनिवार को जगदगुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय में आधुनिक जीवन में ऋषि परंपरा, विषय पर संगोष्ठी का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि कई लोग धर्म व राष्ट्र धर्म को भूलकर राजनीतिक स्वार्थ में भटक जाते हैं। ऋषि परंपरा इसकी इजाजत नहीं देती। हर शासन में ऋषियों की ही बात निर्णायक मानी जाती रही है। आज देश लगातार तरक्की की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि ऋषियों वाले क्षेत्र में आकर नानाजी देशमुख और रामभद्राचार्य जैसे ऋषियों के जीवन से रूबरू होना गौरव की बात है।
उन्होंने जगदगुरु रामभद्राचार्य के लिए कहा कि अभी तक उनका एकलव्य था, आज शिष्य बनकर जा रहा हूं। इससे पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ पत्नी डॉ. सुदेश धनखड़ के साथ दीनदयाल शोध संस्थान की हवाई पट्टी पर हेलीकॉप्टर से उतरे। उन्होंने भारत रत्न नानाजी देशमुख की मूर्ति पर माल्यार्पण कर पदाधिकारियों से भेंट की। उपराष्ट्रपति का मध्यप्रदेश की मंत्री प्रतिभा बागरी, उत्तर प्रदेश के मंत्री नंदगोपाल गुप्ता नंदी, नरेंद्र कश्यप व अनिल राजभर ने स्वागत किया।
मर्यादा लांघने वालों को धनखड़ बखूबी नियंत्रित करते : रामभद्राचार्य
पद्मभूषण से सम्मानित जगदगुरु रामभद्राचार्य ने कहा कि राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की त्रिवेणी हैं। भारत का यह प्रयाग हैं। भारत तरक्की के मामले में चीन को भी पीछे छोड़ रहा है। चुटकी लेते हुए कहा कि संसद में जब विपक्षी अहंकार के कारण मर्यादा पार करते हैं तो धनखड़ उन्हें बेहतर कमांड करते हैं।
युद्ध नहीं बातचीत से खत्म हों विवाद
उपराष्ट्रपति ने कहा कि जी-20 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास से देश का गर्व बढ़ा। दुनिया में जहां भी युद्ध हो रहे हैं, वहां के देश भारत की ओर शांति की उम्मीद से देख रहे हैं। युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है। बातचीत से ही सारे विवाद खत्म होते हैं। यही ऋषि परंपरा है और भारत इस पर अटल विश्वास करता है। यही कारण है कि पांच हजार साल बाद भी यह परंपरा आज भी प्रासंगिक है।