हमारी मातृभाषा हिंदी का क्रमिक विकास हुआ है। आज जो हिंदी हम पढ़ते हैं, वह पहले ऐसी नहीं थी। हिंदी को पोषित करने में कानपुर और आसपास के जिलों का बड़ा योगदान रहा है। इस परिक्षेत्र में कई ऐसे सपूतों ने जन्म लिया, जिन्होंने हिंदी के बीजों को अपनी कलम से अभिसिंचित कर विशाल वृक्ष में रूपांतरित किया।
इन लोगों की ही देन है कि आज हम गर्व से कहते हैं ‘हिंदी हैं हम’। भाषा अंतर्निहित मनोभावों और विचारों को न सिर्फ प्रकट करने का माध्यम होती है, बल्कि यह हमारे दैनिक क्रियाकलाप का सबसे महत्वपूर्ण अंग भी है। भाषा से हमें पहचाना भी जाता है। ‘हिंदी हैं हम’ अभियान के अंतर्गत हिंदी प्रेमियों-सेवियों से आपका परिचय हम निरंतर कराते रहेंगे।
हिंदी के प्रथम पूज्य
हिंदी के पाणिनि कानपुर से
हिंदी यानी हमारी मातृभाषा को समृद्ध करने में कानपुर के मंधना में जन्मे आचार्य किशोरीदास वाजपेयी का नाम अग्रिम पंक्ति में है। हिंदी का व्याकरण तय करने में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही है। ‘हिंदी शब्द मीमांसा’ और ‘हिंदी शब्दानुशासन’ पुस्तकें लिखकर उन्होंने भाषा का विधान बनाया। उन्हें हिंदी का पाणिनि भी कहा जाता है।
हिंदी साहित्य के युगपुरुष आचार्य द्विवेदी
रायबरेली के दौलतपुर में जन्मे और कानपुर में रहकर साहित्यिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का संपादन करने वाले आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने तो हिंदी के विकास में वह भूमिका निभाई कि हिंदी साहित्य में एक कालखंड को द्विवेदी युग कहा जाता है।
हिंदी के ‘प्रताप’
जन्मभूमि तो प्रताप नारायण मिश्र की उन्नाव थी, लेकिन कर्मभूमि कानपुर। हिंदी के विकास में प्रताप नारायण मिश्र की भूमिका भी अग्रणी है। ‘ब्राह्मण’ समाचारपत्र निकालकर उन्होंने हिंदी को और अच्छा स्वरूप देने का प्रयास किया।
हिंदी के मार्तंड का उदय
भाषा को समृद्ध करने और राष्ट्रीयता की भावना भरने में समाचारपत्रों की महती भूमिका होती है। इस बात को समझा कानपुर के युगल किशोर शुक्ल ने, जिन्होंने 30 मई 1826 को कलकत्ता (अब कोलकाता) से हिंदी का पहला समाचारपत्र ‘उदंत मार्तंड’ निकाला। इसके प्रकाशन के साथ ही हिंदी की समृद्धि भी प्रारंभ हो गई।