कानपुर। उर्सला अस्पताल में पिछले दो सालों से बहरापन की जांच करने वाली बेरा मशीन गूंगी बनी खड़ी है। दान में मिली पांच लाख रुपये की इस मशीन से एक भी जांच नहीं हो सकी है। दरअसल जांच के बाद रिपोर्ट देने वाला मशीन में सॉफ्टवेयर ही नहीं है। जांच के लिए रोगियों को लखनऊ एसजीपीजीआई व केजीएमयू रेफर किया जाता है।
हैलट और उर्सला अस्पतालों में रोजाना 400-500 सौ मरीज कान की समस्या लेकर पहुंचते हैं। इनमें 30 प्रतिशत रोगियों में बहरेपन की जांच की जरूरत पड़ती है। वहीं उर्सला अस्पताल और सीएमओ कार्यालय में विकलांग प्रमाण पत्र भी बनाए जाते हैं। दोनों अस्पतालों से हर महीने 30 से ज्यादा मरीजों को लखनऊ एसजीपीजीआई और केजीएमयू रेफर किया जा रहा है। हालांकि इसकी वजह से मरीज परेशान भी होते हैं क्योंकि एसजीपीजीआई में दो महीने तो केजीएमयू में इससे ज्यादा समय लग जाता है।
उर्सला अस्पताल को बेरा मशीन एचएएल ने दान की थी लेकिन इसमें सॉफ्टवेयर नहीं था। तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार मशीन की कीमत करीब आठ से 10 लाख रुपये है। इसमें करीब चार लाख रुपये का साॅफ्टवेयर पड़ता है। मशीन बहरेपन की जांच करती है जबकि सॉफ्टवेयर इसकी रिपोर्ट देता है। निदेशक डॉ. एचडी अग्रवाल ने बताया कि सॉफ्टवेयर के लिए शासन को पत्र लिखा गया है। मशीन जल्द शुरू हो इसकी कोशिश की जा रही है।