छप्पर के छोटे-छोटे वार्ड आते हैं नजर
सीमेंट के कुछ पोल भी खड़े हैं और इन्हीं के सहारे छत के नाम पर टीनशेड है। देखने में लगता है कोई अवैध अस्पताल संचालित है, लेकिन जब इसके बारे में जानकारी जुटाई गई तो पता चला कि गत वर्ष ही इस अस्पताल का संचालन हुआ और संचालन के पहले बाकायदा स्वास्थ्य विभाग में इसका पंजीकरण भी कराया गया। अस्पताल परिसर में घूमने पर यहां छप्पर के छोटे-छोटे वार्ड नजर आते हैं।
अजब-गजब अस्पताल पर नहीं पड़ी किसी की नजर
इन छप्परों के नीचे बेड पड़े हुए हैं। कुछ बेड खाली हैं, तो कुछ पर मरीज भी हैं। पहली नजर में लगता है कि ढाबे के पीछे छप्परनुमा कॉटेज बने हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल मरीजों का इलाज करने में हो रहा है। मजे की बात यह है कि संडीला तहसील के जिम्मेदारों से लेकर स्वास्थ्य महकमे के जिम्मेदार तक इस राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरते हैं, लेकिन किसी की नजर इस अजब-गजब अस्पताल पर नहीं पड़ी।
कैंसर का चल रहा है इलाज
यहां भर्ती उन्नाव जिले के जहांगीराबाद इलाके के कमलापुर निवासी पूनम ने बताया कि डॉक्टर के मुताबिक उसे कैंसर है। महीने में लगभग 40 हजार खर्च होने की बात बताई। कछौना कोतवाली क्षेत्र के बक्साखेड़ा निवासी गोकरन के परिजनों के मुताबिक सिर में कैंसर है। चार माह से इलाज चल रहा है। वह भी छप्पर के नीचे बेड पर भर्ती मिले।
अस्पताल के पंजीकरण में कम से कम यह होना चाहिए
- अस्पताल की पक्की इमारत। इमारत में हवादार कमरे।
- अग्निशमन यंत्र या अंदर ही अग्निरोधी प्लांट।
- प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का अनापत्ति प्रमाण पत्र।
- मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट की व्यवस्था।
- कम से कम एक एमबीबीएस चिकित्सक।
- प्रसाधन के संसाधन।
जो सुविधाएं हैं उसी के हिसाब से इलाज किया जा रहा है। टीनशेड बना है। वहां गर्मी थी। इसलिए मरीजों को झोपड़ी में (छप्पर) शिफ्ट किया गया है। -डॉ. एके पासवान, संचालक, फौजी हॉस्पिटल
टीनशेड के नीचे अस्पताल और छप्पर के नीचे वार्ड नहीं संचालित किया जा सकता। यह बिल्कुल गलत है। अगर ऐसा है तो पंजीकरण निरस्त किया जाएगा। यह भी देखा जाएगा कि पंजीकरण के समय कौन अफसर मौके का निरीक्षण करने गया था। लापरवाही करने वाले अफसरों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. रोहताश कुमार, सीएमओ