खुद के लिए तो सभी जीतें हैं, क्यों न कुछ लोग दूसरों के लिए भी जीना सीख लें। यह कहना है सोशल एंटरप्रिन्योर और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय का। वह ‘उत्थान... अ स्टार्टअप निर्माण’ कार्यक्रम में शामिल होने के लिए शनिवार को पीएसआईटी पहुंचे थे।
छात्रों से संवाद करते हुए उन्होंने अपनी सफलता की कहानी बताई। मूल रूप से वाराणसी के रहने चंद्रप्रकाश पांडेय के पिता चंद्रमा पांडेय शिक्षक और मां संजू पांडेय गृहणी हैं। वर्ष 2000 में उदय प्रताप ऑटोनॉमस कॉलेज से बीएससी करने के बाद वर्ष 2003 में हरीश चंद्र डिग्री कॉलेज, वाराणसी से एलएलबी किया।
अगले साल ही उनकी बीएसएफ में बतौर इंस्पेक्टर नौकरी लग गई। चंद्र प्रकाश बताते हैं कि उनके गांव में शिक्षा का स्तर बेहद कम था। आसपास के गांवों में भी छोटे बच्चे स्कूल की बजाय खेतों में काम करते थे।
ट्रेनिंग के बाद जब वह वापस गांव लौटे तो उन्हें यह नजारा देख दुख हुआ। उसी वक्त उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला ले लिया। चंद्र प्रकाश बताते हैं कि मध्यमवर्गीय परिवार से होने के चलते उन पर काफी जिम्मेदारियां थीं, लेकिन उन्होंने समाज के लिए जीने का फैसला ले लिया और समर्पण सेवा समिति की शुरूआत की।
बतौर अधिवक्ता आज वह सैकड़ों गरीबों की आवाज बन चुके हैं। गरीबों के लिए हर कानूनी अड़चनों को मुफ्त में निस्तारित करवाने का काम करते हैं। चंद्र प्रकाश बताते हैं कि नौकरी छोड़ने के बाद सबसे पहले उन्होंने किसानों को समझाना शुरू किया कि उनके बच्चों के लिए शिक्षा कितनी जरूरी है।
चंद्रप्रकाश खुद बच्चों को पढ़ाने लगे। कई लोग मान गए और उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। नके इस काम को देखते हुए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के दर्जनों छात्र उनसे जुड़ गए। एक-एक करके आज करीब 2500 युवाओं की टीम है जो वाराणसी और आसपास के इलाकों में गरीब बच्चों को शिक्षित कर रही है।
चंद्रप्रकाश ने विकलांगों और महिलाओं के हक की लड़ाई के लिए भी खूब संघर्ष किया है। उन्हें पीआईएल दाखिल करने में माहिर माना जाता है। उन्होंने विकलांगों को सरकारी नौकरी में सहूलियत के लिए पीआईएल दाखिल की थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा था कि विकलांगों को उनके गृह जनपद में तैनाती दी जाए।