22 मई 1988 को बाबरी मस्जिद आंदोलन समिति ने मस्जिद निर्माण के लिए 12 अगस्त और 14 अक्तूबर को विशाल मार्च की घोषणा की। इस पर हिंदू संगठनों में उत्तेजना पैदा हुई। बजरंग दल ने 1000 बलिदानी जत्थे तैयार किए थे। विश्व हिंदू परिषद ने मुसलमानों के कार्यक्रम को पूरी तरह से विफल बनाने की तैयारी कर ली थी। तब सरकार कुछ करवाना चाह रही थी। हिंदू मुस्लिम अपनी जिद पर अड़े थे। तब मन की बात सुनता था कि हिंसा नहीं होने देना है। आपसी भाईचारा नहीं बिगड़ने देना है।
जब संतों से भर गई थी अयोध्या
विश्व हिंदू परिषद ने 6 नवंबर 1989 को देव उत्थान एकादशी के मौके पर श्रीराम जन्म भूमि पर मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास कार्यक्रम की घोषणा की थी। गर्भ गृह से 192 फीट की दूरी पर शिलान्यास की जगह सुनिश्चित की गई। आठ फीट का चतुर्भुज बनाकर वहां ध्वज गाड़ दिया गया और यह नारा दिया गया कि मंदिर यहीं बनेगा। पूरे राष्ट्र से राम पूजित शिलाएं अयोध्या पहुंचने लगीं। हजारों साधु संत अयोध्या पहुंच रहे थे। इस कार्यक्रम को मुस्लिम समुदाय के लोग विफल करना चाह रहे थे। प्रदेश सरकार ने भी इस बात पर आपत्ति जताई कि घोषित स्थल पर शिलान्यास नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने भी स्टे दे दिया था लेकिन जनभावना थी कि वह रुकने का नाम नहीं ले रही थी। ऐसे में एक प्रशासक को जो करना चाहिए था, वही किया। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद शिलान्यास कार्यक्रम हुआ, कराया गया।
सब स्वार्थ में थे, मंदिर बनाने की मंशा नहीं थी
रामशरण श्रीवास्तव ने अयोध्या विवाद पर तीन किताबें लिखी हैं। चौथी किताब फैसले के बाद आएगी। इनकी एक किताब को बतौर सबूत हाईकोर्ट में भी पेश किया गया। वे बताते हैं कि पूर्व की सरकारों ने राजनीतिक नफा नुकसान की वजह से इस विवाद को लटकाए रखा। छह दिसंबर 1992 को ढहाया गया विवादित ढांचा, राम मंदिर तोड़कर ही निर्मित किया गया था। राजनीतिक संगठन यह बात भलीभांति जानते थे लेकिन वे मानने को तैयार नहीं थे। यह बात उन्होंने कई बार तत्कालीन सरकार के समक्ष रखी लेकिन उसे अनसुना ही किया गया। यह विवाद बाहरी लोगों के दखल की वजह से इतना लंबा चला। अयोध्या के लोगों के हाथ में दे दिया जाता तो कब का हल हो जाता।