‘अमर उजाला’ में खबर छपने के बाद शुक्रवार को शासन ने जेके कैंसर संस्थान की सात करोड़ रुपये की लिनियर एसीलरेटर मशीन को ठीक कराने के लिए आनन-फानन में 70 लाख रुपये जारी कर दिए। और तो और कुछ अन्य उपकरणों के लिए भी 29 लाख रुपये दिए। बता दें कि यह बजट दो साल से फंसा था। बजट जारी होने की जानकारी के बाद जेके कैंसर संस्थान के डायरेक्टर डॉ. एमपी मिश्र ने सिमेंस कंपनी के अधिकारियों से बात की। उम्मीद है कि सोमवार को कंपनी के अधिकारी कानपुर आ जाएंगे और मशीन को स्टार्ट कर इसकी सूचना भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर को भेज दी जाएगी। 16 जून तक मशीन के स्टार्ट होने की सूचना भाभा सेंटर को मिल जाएगी तो भाभा सेंटर का एटॉमिक एनर्जी रेगुलेटरी बोर्ड मशीन के रेडिएशन विकिरण का लाइसेंस रद नहीं करेगा और यह महत्वपूर्ण मशीन बंद होने से बच जाएगी।
कैंसर मरीजों के इलाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण लिनियर एसीलरेटर मशीन बंद होने और इससे हजारों मरीजों को परेशानी होने का मुद्दा ‘अमर उजाला’ ने शुक्रवार के अंक में प्रमुखता से उठाया। शुक्रवार सुबह इसका पता चलने पर महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा (डीजीएमई) डॉ. वीएन त्रिपाठी ने तुरंत शासन स्तर पर बात कर इस समस्या की जानकारी दी और इस संबंध में जेके कैंसर संस्थान के पहले से लंबित मांग पत्रों का ब्योरा शासन को दिया। समस्या को संज्ञान में लेते हुए शासन ने कुछ ही घंटे बाद मशीन के मेंटिनेंस के लिए 70 लाख रुपये जारी कर दिए। डॉ. त्रिपाठी ने बताया कि जेके कैंसर संस्थान के डायरेक्टर से तत्काल मेंटिनेंस कंपनी के इंजीनियरों को बुलाकर मशीन ठीक कराने को कहा गया है। कुछ अन्य उपकरण और नई मशीनें भी संस्थान में लगेंगी। जेके कैंसर संस्थान के डायरेक्टर डॉ. एमपी मिश्र ने बताया कि शुक्रवार को डीजीएमई ने बजट जारी होने की जानकारी दी है। मेंटिनेंस कंपनी के अधिकारियों को फोन से सूचना दे दी गई है। उम्मीद है कि सोमवार को मशीन ठीक करने के लिए कंपनी की टीम आ जाएगी। अब मशीन बेकार नहीं होगी।
यह है मामला
जेके कैंसर संस्थान में लिनियर एसीलरेटर मशीन वर्ष 2009 में आई थी। वर्ष 2010 में मशीन से रेडियोथेरेपी शुरू हुई। तीन साल तक जर्मनी की कंपनी सिमेंस से निशुल्क वार्षिक रखरखाव का अनुबंध था। इसके बाद हर साल 35 लाख रुपये का अनुबंध शासन ने कंपनी से किया था। तीन साल तक कंपनी मशीन का मेंटिनेंस करती रही। इसके बाद 2013 में कंपनी को जल्द पेमेंट का वादा कर मेंटिनेंस कराया गया। 2014 में मशीन का 35 लाख रुपये का उपकरण खराब हो गया। शासन से दो साल का मेंटिनेंस शुल्क और उपकरण के लिए धन की मांग की गई। 2014 के अंत में शासन ने उपकरण के लिए बजट जारी कर दिया लेकिन मेंटिनेंस का पैसा नहीं दिया। इस कारण कंपनी ने उपकरण लगाने और मेंटिनेंस करने से इंकार कर दिया। तब से लगातार शासन को बजट के लिए लिखा जाता रहा पर कुछ नहीं हुआ। अगर 16 जून तक मशीन शुरू नहीं होती तो भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर इसे कंडम घोषित कर देता। इससे पहले पांच करोड़ रुपये की कोबाल्ट मशीन बजट न मिलने के कारण कंडम घोषित की जा चुकी है।
मुख्य न्यायाधीश ने फैसले में किया है मशीन का जिक्र
जन उत्थान विधिक सेवा समिति हंसपुरम नौबस्ता की सारिका द्विवेदी और आशुतोष द्विवेदी की जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ. डीवाई चंद्रचूड ने 10 मार्च 2015 को अपने आदेश में लिनियर एसीलरेटर मशीन के लिए बजट जारी करने को सरकार को आदेश दिया था। मुख्य न्यायाधीश ने कैंसर के इस महत्वपूर्ण संस्थान की बदहाल स्थिति पर कड़ी नाराजगी जताई थी लेकिन सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी।
सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे
‘अमर उजाला’ में जेके कैंसर संस्थान की दुर्दशा की खबर प्रकाशित होने के बाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल करने वाले जन उत्थान विधिक सेवा समिति की सचिव सारिका द्विवेदी और आशुतोष द्विवेदी ने शुक्रवार को डीएम और संस्थान के निदेशक को ज्ञापन दिया। उन्होंने ज्ञापन के साथ ‘अमर उजाला’ में छपी खबर की कटिंग भी लगाई। आशुतोष द्विवेदी ने कहा कि जेके कैंसर संस्थान की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी जाएगी।
रेडियोथेरेपी के लिए अब नहीं जाना पड़ेगा लखनऊ
जेके कैंसर संस्थान में एचडीआर मशीन लगने का रास्ता साफ
कानपुर। कैंसर मरीजों के लिए एक और अच्छी खबर है। जेके कैंसर संस्थान में हाई डोज रेट (एचडीआर) मशीन लगने का रास्ता साफ हो गया है। इस मशीन के शुरू होने के बाद ब्रेकी थेरेपी के लिए कैंसर मरीजों को लखनऊ नहीं जाना पड़ेगा। एचडीआर मशीन के लिए 2013 में ही चार करोड़ 11 लाख रुपये जारी हो गए थे लेकिन मशीन नहीं आ पाई थी। मशीन आई तो इसे इंस्टाल करने को इंजीनियर नहीं आ रहे थे। संस्थान के डायरेक्टर ने कंपनी को लीगल नोटिस भेजा तो अब कंपनी ने मशीन इंस्टाल करने पर हामी भरी है। डायरेक्टर डॉ. एमपी मिश्र ने बताया कि कंपनी को 25 जून तक मशीन इंस्टाल करने को कहा गया है। एचडीआर मशीन शुरू होने से नाक, कान, गले, बच्चेदानी आदि स्थानों पर अंदर की ओर के ट्यूमर की भी रेडियोथेरेपी की जा सकेगी। अभी यह सुविधा लखनऊ में ही है।
इनसेट
यह है ब्रेकी थेरेपी
कैंसर मरीजों की दो तरह की रेडियोथेरेपी होती है। एक टेली थेरेपी और दूसरी ब्रेकी थेरेपी। टेली थेरेपी में कैंसर प्रभावित स्थान की दूर से रेडियोथेरेपी की जाती है। ब्रेकी थेरेपी में प्रभावित स्थान से बिल्कुल सटकर रेडियोथेरेपी की जाती है। ब्रेकी थेरेपी की मशीन कानपुर में न होने के कारण मरीजों को लखनऊ जाना पड़ता था। महीनों पहले नंबर लेना पड़ता था।