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बेहमई कांड: आठ साल पुराने प्रार्थना पत्र को अदालत ने किया खारिज

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कानपुर देहात। बेहमई कांड में मंगलवार को आठ साल पुराने प्रार्थना पत्र पर बहस हुई। इसमें बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने गवाहों का पुलिस में दिए गए बयान से सामना कराने की मांग की थी। अभियोजन ने इसका विरोध करते हुए तर्क दिया कि ये कार्रवाई पहले पूरी हो चुकी है। इसे दोबारा करने की जरूरत नहीं है। इसके बाद कोर्ट ने प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया।
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14 फरवरी 1981 को बेहमई गांव में फूलन देवी ने अपने साथियों के साथ मिलकर बीस लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। मामले की सुनवाई एंटी डकैती कोर्ट सुधाकर राय की अदालत में हो रही है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता गिरीश नारायण दुबे ने अदालत से पुराने प्रार्थना पत्र के निस्तारण की मांग की। उन्होंने बताया कि 17 जनवरी 2013 को पत्र देकर अनुरोध किया था कि पुलिस को दिए गए बयान से गवाहों का अदालत में सामना कराया जाए। पिछली तारीख पर इसी प्रार्थना पत्र के निस्तारण की मांगी थी। इस बार इस पुराने प्रार्थना पत्र को पत्रावली में ढूंढ कर कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया। इसके बाद बहस हुई।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस को दिए गए गवाहों के बयानों का सामना कराना जरूरी है। उन्होंने बताया कि चार दिसंबर 2012 को गवाह छोटेलाल ने कोर्ट के समक्ष बयान दिया था कि कोर्ट में मूल केस डायरी सामने न होने से वह घटना के बाबत कुछ नहीं बता सकते।
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जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल ने बचाव पक्ष के तर्कों का विरोध करते हुए अदालत के सामने पक्ष रखा कि कोर्ट में गवाही की कार्रवाई पहले पूरी हो चुकी है। 15 गवाह पेश किए गए थे, उनसे जिरह भी हो चुकी है। अब इसका कोई मतलब नहीं है। इस पर कोर्ट ने बचाव पक्ष के अधिवक्ता का प्रार्थना पत्र खारिज कर दिया। जिला सहायक शासकीय अधिवक्ता ने बताया कि मामले की सुनवाई 10 नवंबर को होगी।
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