कानपुर। होर्मुज जलडमरूमध्य अधिक दिनों तक बंद रहा तो अगले सीजन में शक्कर महंगी हो जाएगी। देश में अधिक सल्फर इसी रास्ते से होकर आता है। इस समय सल्फर आ नहीं आ पा रहा। इसके दाम चार गुना बढ़ गए हैं। यह बात नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने मंगलवार को पत्रकार वार्ता के दौरान कही। उन्होंने बताया कि आज भी 85 फीसदी चीनी मिलें सल्फर का इस्तेमाल कर रही हैं। प्रदेश की 122 चीनी मिलों में सिर्फ 15 चीनी मिल वैकल्पिक तरीका अपना रही हैं।
देश में सबसे अधिक सल्फर मोरक्को से आयात किया जाता है। यह होर्मुज के रास्ते होकर यहां आता है। प्रोफेसर मोहन ने बताया कि एक टन गन्ना रस की सफाई में चूना और सल्फर का इस्तेमाल होता है। सीजन में तीन हजार लाख टन गन्ना की पेराई की जाती है। सल्फर के स्थान पर चीनी सप्लाई के लिए वैकल्पिक तरीके अपनाए जाते हैं। उन्होंने बताया कि वैकल्पिक तरीकों में सल्फर के स्थान पर फास्फोरिक एसिड और कार्बनडाई आक्साइड का इ्स्तेमाल किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि फार्मास्युटिकल्स, पेय पदार्थ आदि कंपनियां सल्फर रहित चीनी की मांग करती हैं। सल्फर से रिफाइन करने पर चीनी में उसका असर आ जाता है। सल्फर रहित चीनी की गुणवत्ता बेहतर होती है। विदेशों में कई कंपनियां सल्फर रहित तरीका अपना रही हैं। सल्फर की कीमत 15 रुपये किलो रही है लेकिन अब इसके दाम 60 रुपये किलो हो गए हैं।