टेनरियों के लिए स्थापित जलनिगम का ट्रीटमेंट प्लांट 20 वर्ष पुराना है। इसलिए उसकी शोधन क्षमता कम हो चुकी है। गंगा में अधिकांश दूषित पानी इसी ट्रीटमेंट प्लांट की वजह से जाता है। आरोप टेनरी वालों पर लगता है।
स्मॉल टेनर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने शनिवार को पत्रकार वार्ता कर गंगा में दूषित जल पहुंचने के मामले में अपना पक्ष रखा।
एसोसिएशन के महामंत्री नैयर जमाल ने कहा कि एसटीपी की क्षमता बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री भी आदेश कर चुके हैं, लेकिन विभागीय अफसर इस पर ध्यान नहीं दे रहे। ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ाने के साथ इसके आधुनिकीकरण की भी जरूरत है। टेनरियों का पानी शोधन के बाद ही गंगा में जाता है, लेकिन ट्रीटमेंट प्लांट कभी कभी खराब भी हो जाते हैं।
इसको ध्यान में रखते हुए ही टेनरी संचालकों ने फैसला लिया है कि माघ मेले के दौरान प्रत्येक स्नान से तीन दिन पहले टेनरियों का काम बंद कर देंगे।
इसके अलावा प्रदूषण नियंत्रण विभाग की ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र देने में देरी पर भी रोष जताया। बताया कि मुख्यमंत्री ने टेनरियों के अलावा अन्य उद्योगों के लिए पांच साल के लिए प्रदूषण संबंधी अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश दिए हैं। ये प्रमाण पत्र भी एक महीने के भीतर जारी होने हैं।
इस दौरान हफीजुर्रहमान, डॉ. फिरोज आलम, महमूद आलम, हाजी मोहम्मद हसन, राणा सिंह यादव, कौशलेंद्र दीक्षित आदि मौजूद रहे।
जलशोधन को लगे एसटीपी की कार्यक्षमता 15 साल
जाजमऊ में टेनरियों के जलशोधन के लिए वर्ष 1994 में एसटीपी की स्थापना हुई थी। इसी तरह डोमेस्टिक एसटीपी वर्ष 1998 में चालू किया गया था। इन दोनों ही एसटीपी की कार्यक्षमता 15 वर्ष ही थी।
दोनों एसटीपी अपनी निर्धारित उम्र पूरी कर चुके हैं। अब इनकी शोधन क्षमता 50 फीसदी तक कम हो चुकी है। जल निगम के प्रोजेक्ट मैनेजर एएस गौड़ ने बताया कि एसटीपी के अपग्रेडेशन के लिए पहले दो बार प्रस्ताव भेज चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार के निर्धारित मानकों का पालन न करने की वजह से उन्हें खारिज कर दिया गया। अब नए मानकों के मुताबिक प्रस्ताव तैयार करवाया जा रहा है।