शहीद कैप्टन आयुष यादव ने मुझे फिर संवार दिया
‘मैं जाजमऊ हूं’, ऊंचे-ऊंचे टीलों के नीचे दबे राज़ों से ढका हूं। गंगा मेरी पवित्रता की सौगंध है, चमड़े से पूरी दुनिया में मेरी पहचान है। मैं उन अंधेरों और उजालों का साथी हूं जो मुझे कानपुर का तिजारती शहर (औद्योगिक उपनगर) जैसा एहसास कराते है। मेरे नाम से मशहूर जिन्नातों की मस्जिद ताजमहल सरीखी नक्काशी के लिए जानी जाती है। सदियों पहले फिरोज शाह तुगलक ने सूफी संत मखदूम शाह का मशहूर मकबरा यहीं बनावाया। इतिहास के पन्नों में दर्ज कानपुर के सबसे ‘बुजुर्ग’ यानी पुराने इलाके के रूप में भी मैं जाना जाता हूं।
लेकिन आज, मैं यूं ही पूरी दुनिया में अलग-अलग और नये - नये रूपों में जाना जा रहा हूं (1. आतंकी सैफुल्ला 2. शहीद कैप्टन आयुष यादव)
जिहाद के नाम पर दहशत फैलाने वालों ने मुझे कैसे-कैसे बदनाम किया। मैं उस सैफुल्ला को कैसे भूल सकता हूं जालिम ने तो मेरा नाम ही मिट्टी में मिला दिया। शुक्र हो उस मेहेरबां देश-प्रेमी कैप्टन आयुष यादव का। जिसकी शहादत ने मेरे नाम को आज फिर से पवित्र कर दिया है। अपने मुल्क के लिए शहीद हुए अपने उस बेटे की आखिरी सूरत देखने को मैं बेचैन हूं।
आतंक के मंसूबे रखने वाले ने मुझे बदनाम किया लेकिन उस मेहेरबां देश-प्रेमी (शहीद कैप्टन आयुष यादव) ने मुझे मेरा खोया हुआ सम्मान वापस दिलाकर मुझे फिर संवार दिया। उन भटके नादानों ने मुझे बदनामी की जंजीरें पहनाईं मगर चाहने वाले ने मुझे, मेरे नाम से जुड़े और पूरे मुल्क के लोगों को राष्ट्र भक्ति क्या होती है ये अच्छी तरह से समझा दिया। मेरा प्यारा बेटा आयुष यादव आज मुझसे अलग जरूर हुआ है लेकिन उसके साथ मेरा नाम हमेशा जुड़ा रहेगा।
मैं, जाजमऊ (कानपुर)
जानें, जाजमऊ के रहने वाले शहीद आयुष और आतंकवादी सैफुल्ला के बारे में...
आयुष ने देशभक्ति और सेना के अलावा कभी कुछ नहीं सोचा
शहीद आयुष यादव की अपने मां-बाप के साथ पुरानी फोटो
शहीद आयुष को देश की सेवा करने का जुनून था। उन्होंने देश विरोधी ताकतों को नेस्तनाबूत और देश के लोगों की सुरक्षा का सपना शुरू से देखा था। पिता अरुणकांत ने बताया कि कानपुर, जाजमऊ डिफेंस कालोनी स्थित सेंट जोजफ स्कूल में प्ले ग्रुप से 12वीं कक्षा तक पढ़ा था। 2009 में इंटरमीडिएट पास करने के बाद आयुष ने वायुसेना में पायलट पद केलिए आवेदन किया था। मेधावी आयुष का सलेक्शन भी हो गया था, लेकिन चंद नंबर कम होने से मेरिट लिस्ट में उनका नाम नहीं आया था। 2011 में आयुष ने छत्रपति शाहू जी महाराज यूनिर्विसिटी से बीसीए किया। फिर एमसीए कर रहे थे। इसी दौरान वह उनकी नौकरी सेना में लग गई। उन्होंने एमसीए की पढ़ाने छोड़कर नौकरी ज्वाइन कर ली थी। अरुणकांत ने बताया कि जब आयुष कक्षा तीन में पढ़ रहा था, तभी से कहता था कि नौकरी करूंगा। उसने सेना के अलावा कहीं भी नौकरी के लिए आवेदन नहीं किया था।
सैफुल्ला
डेह महीने पहले 8 मार्च को लखनऊ एनकाउंटर में मारे गए आतंकी सैफुल्ला के पिता सरताज ने बेटे का शव लेने से मना कर दिया था और ये बात कहकर सबको चौंका दिया कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। देशद्रोही के साथ ऐसा ही होना चाहिए। कानपुर के जाजमऊ इलाके का रहने वाला सैफुल्ला धर्मस्थलों पर धमाका करने की साजिश रच रहा था। कानपुर के मनोहर नगर, जाजमऊ इलाके में 1995 में सैफुल्ला का जन्म हुआ था। सैफुल्ला बचपन से ही पढ़ने में तेज था। उसके पिता सरताज छोटा-मोटा बिजनेस करते हैं। सैफुल्ला के दो भाई खालिद और मुजाहिद हैं एक बहन बहन भी है। चार भाई बहनों में सैफुल्ला तीसरे नंबर का था। सैफुल्ला के पिता सरताज केछह भाई हैं। जिनमें नूर अहमद, ममनून, सरताज, और मंसूर मनोहर नगर वाले घर में रहते हैं और दो बाकी दो भाई नसीम और इकबाल तिवारीपुर वाले मकान में रहते हैं। सैफुल्ला बीकॉम सेकेंड ईयर की पढ़ाई कर रहा था। आतंकवादी संगठन आईएसआईएस के संपर्क में आने के बाद उसने अपने घर में बम बनाने के तरीके सीखे थे। आमतौर पर शांत रहने वाला सैफुल्ला कभी-कभी ऐसा बन जाता था कि जैसे वह शैतान हो। उसके मोहल्ले के दोस्तों ने बताया कि पांच साल पहले सैफुल्ला का एक लड़की को लेकर इलाके में ही विवाद हो गया था जिसके बाद उसने असलहों से हवाई फायरिंग भी की थी। सैफुल्ला के घर से पुलिस को आईएसआईएस का झंडा और बम बनाने के आईटम के साथ हिन्दुस्तान का झंडा नक्शा भी मिला है। बुधवार को सैफुल्ला की मौत के बाद उसके पिता ने घटना पर अफसोस जताते हुए कहा कि जो देश के खिलाफ हम उसके खिलाफ हैं। वहीं रिश्तेदारों ने कहा कि सैफुल्ला का व्यवहार काफी अच्छा था। वह पांच वख्त की नमाज पढ़ता था। हमें ऐसी उम्मीद नहीं कर रखी थी कि वह आतंकवादी बन जाएगा।