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कोरोना वारियर्स की कहानी उन्हीं की जुबानी: दर्द और डर से बड़ी कोरोना को हराने की जिम्मेदारी

Fri, 17 Apr 2020 01:24 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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आरके सिंह, इंस्पेक्टर, जालौन - फोटो : amar ujala
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कोरोना के खिलाफ सबसे आगे आकर युद्ध लड़ रहे डाॅक्टर्स, मेडिकल स्टाफ और पुलिसकर्मियों को पीएम मोदी ने कोरोना वॉरियर्स की उपाधि से नवाजा है। हम आपको कुछ ऐसे ही कोरोना वॉरियर्स की कहानी बताने जा रहे है जो दिन रात कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। जिससे आप घर में सुरक्षित रहें।
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दर्द से बड़ी ड्यूटी है, ऑपरेशन के बाद ड्यूटी ज्वाइन की
लॉकडाउन के दौरान पुलिस की सख्त ड्यूटी, लगातार जीप में बैठकर गश्त करना। धूप और पसीने से रामपुरा थाने में तैनात इंस्पेक्टर आरके सिंह की पीठ पर फोड़ा हो गया था। कुछ दिन वह दर्द में ड्यूटी करते रहे। लेकिन जब दर्द असहनीय हो गया तो डॉक्टरों ने उनको ऑपरेशन की सलाह दी। दस अप्रैल को ऑपरेशन किया गया। डॉक्टर ने दो दिन बेड रेस्ट की सलाह दी।

आरके सिंह कहते हैं आम दिन होते तो मैं डॉक्टर की सलाह मान लेता लेकिन ऐसी संकट की घड़ी में दर्द से कहीं बड़ी ड्यूटी है। ऑपरेशन के दूसरे दिन मैंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली। दर्द अब भी है लेकिन मेरी वजह क्षेत्र की स्थिति नियंत्रण में रहे इससे मेरा दर्द कम हो जाता है। परिवार सीतापुर में है, मेरी स्थिति जान वे विचलित होते हैं लेकिन ड्यूटी का महत्व समझते हैं।
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डॉ. अनुपमा पाल, महिला चिकित्साधिकारी, जालौन - फोटो : amar ujala
बच्चे कहते घर से काम करो, डॉक्टर हूं कैसे करूं
जालौन सीएचसी में बने कोरोना आइसोलेशन वार्ड में 240 महिला संदिग्धों की जांच करने वालीं डॉ. अनुपमा की दस साल बेटी और सात साल का बेटा उनसे वर्क फ्रोम होम करने की बात कहते हैं। बच्चे कोरोना से डरे हुए हैं, डॉक्टरों के आए दिन चपेट में आने वाली खबरों से व्याकुल हो उठते हैं।

मैं उनसे कहती हूं कि मैं डॉक्टर हूं, घर से काम नहीं कर सकती। अस्पताल को मेरी जरूरत है। डॉ. अनुपमा मानती हैं कि इस काल में ड्यूटी के साथ थोड़ा डर भी है। लेकिन सतर्कता से ही आपकी जीत होगी। पति बच्चों का हौसला बढ़ाते हैं।

दीवारों पर संदेश लिखता हूं ताकि लोग समझें
कोरोना से इस युद्ध में अपनी कला के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैला रहे शारदा प्रसाद साहू मानते हैं कि एक अच्छा संदेश यदि लोगों के जहन में बैठ गया तो वह उसे हमेशा याद रखते हैं। रंगों का डिब्बा और हाथों में तूलिका लेकर शारदा शहर की दीवारों पर कोरोना से बचने के संदेश लिखते हैं।

ऐसे करने के लिए न तो उन्हें कोई वित्तीय सहायता मिलती है न ही सरकारी धन। वह मन से इस लड़ाई में कूदे हैं। कड़ी धूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। शहर में 50 से ज्यादा स्थानों पर जागरूकता भरे संदेश लिख चुके हैं, ताकि जिसकी भी नजरें पडे़ जागरूक हो।
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