ए-वन क्लास का दर्जा प्राप्त सेंट्रल स्टेशन पर थर्ड क्लास की सुविधाएं भी नहीं हैं, यह एक बार फिर साबित हो गया। सेंट्रल स्टेशन पर शनिवार रात रेलवे की घोर लापरवाही से एक घायल यात्री को पौन घंटे तक इलाज ही नहीं मिला।
हुआ यूं कि श्रमशक्ति पर चढ़ते समय रिटायर्ड फौजी बरकत उल्ला (72) का पैर फिसल गया और वे प्लेटफार्म और पटरी के बीच फंस गए। गाड़ी रेंग रही थी इसलिए उनका पैर बुरी तरह रगड़ गया। चीखने पर चेन पुलिंग की गई। बरकत तड़पते रहे। सूचना के बावजूद रेलवे डॉक्टरों की टीम करीब 45 मिनट तक वहां नहीं पहुंची।
यात्रियों और जीआरपी ने किसी तरह उन्हें प्लेटफार्म और पटरी के बीच से खींचकर निकाला लेकिन एंबुलेंस नहीं थी, इसलिए लहूलुहान बरकत को टेंपो में लादकर उर्सला पहुंचाया गया। इसके काफी देर बाद रेलवे के डॉक्टर स्टेशन पहुंचे। बाद में प्राइवेट अस्पताल में उनका पैर काटना पड़ा।
शर्मनाक बात यह है कि जिम्मेदार रेलवे लोको अस्पताल के चीफ मेडिकल सुपरिंटेंडेंट (सीएमएस) डॉ. वाईएस अटोरिया कहते हैं कि किसी भी घटना का मेमो (लिखित सूचना) आने पर डॉक्टर भेजे जाते हैं। अमर उजाला ने उनसे पूछा कि यदि मेमो नहीं जाएगा तो क्या किसी गंभीर घायल को भी अस्पताल नहीं भिजवाया जाएगा। इस पर अटोरिया कहते हैं, हां नियम है तो है, बिल्कुल नहीं भिजवाया जाएगा।
श्रमशक्ति एक्सप्रेस शनिवार रात लगभग 10:45 बजे सेंट्रल स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर-एक पर आई। कुछ देर बाद मोती नगर जाजमऊ निवासी रिटायर्ड फौजी बरकत उल्ला जनरल बोगी में चढ़ने लगे तो ट्रेन चल दी। उनका पैर फिसल गया और वे ट्रेन व पटरी के बीच गिर गए।
प्लेटफार्म पर मौजूद यात्रियों के शोर मचाने पर चेन पुलिंग की गई। बीच में फंसे बरकत तड़प रहे थे। सूचना पर जीआरपी इंस्पेक्टर नंदजी यादव सिपाहियों के साथ आए। बड़ी मुश्किल से आड़ा-तिरछा कर बरकत को निकाला गया। जीआरपी ने स्टेशन के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट दफ्तर को घटना की सूचना भेजी और डॉक्टर के आने का इंतजार करने लगे।
आधे घंटे तक डॉक्टरों की टीम वहां नहीं पहुंची और बरकत दर्द से तड़पते- करहाते रहे। हालत बिगड़ती देख इंस्पेक्टर ने पुलिसकर्मियों की मदद से टेंपो से उन्हें उर्सला अस्पताल भेजा। बाद में परिजन उन्हें सिविल लाइंस के लीलामणि अस्पताल ले गए। रविवार को डॉक्टरों को बरकत का एक पैर काटना पड़ा।
इस बाबत लोको अस्पताल के सीएमएस डॉ. वाईएस अटोरिया से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस घटना की जानकारी ही नहीं है। जांच करवाएंगे लेकिन वह उस डॉक्टर का नाम नहीं बता पाए जिसकी शनिवार रात ड्यूटी थी। अब सवाल यह है कि क्या वह डॉक्टर का नाम बताना नहीं चाहते या फिर जानबूझकर अनजान बन रहे हैं। और तो और, गर्दन बचाने के लिए मेमो का भी बहाना बनाने लगे।