इटावा छात्रवृत्ति घोटाला रोकने में मशीनी सिस्टम काफी कारगर साबित हुआ है। आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की जांच में 64 स्कूलों के प्रबंधकों और प्रधानाचार्यों द्वारा 14.61 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति डकारने का जो मसला उजागर हुआ है। वह लचर व्यवस्था का परिणाम रहा है।
इसमें स्कूल प्रबंधन के हाथों में रकम रही। छात्र संख्या के सत्यापन में खेल हुआ। लिहाजा गरीब बच्चों का हक हड़प कर लिया गया। वर्ष 2014 से सिस्टम बदला, तब घपला करने के रास्ते बंद हो पाए। अब लखनऊ एनआईसी के पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम (पीएफएमएस) से सीधे छात्रों के बैंक खाते में छात्रवृत्ति पहुंचती है।
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जिले में वर्ष 2008-09 छात्रवृत्ति वितरण के घोटाले में फंसे 82 स्कूलों की संख्या दर्शाती है कि स्कूलों के आरोपी प्रबंधन ने व्यवस्था में झोल का भरपूर फायदा उठाया। इनमें 64 के खिलाफ ईओडब्ल्यू, 11 के खिलाफ जिला समाज कल्याण अधिकारी इंद्रा सिंह और सात स्कूलों के खिलाफ मौजूदा जिला समाज कल्याण अधिकारी शिशुपाल सिंह ने एफआईआर दर्ज कराई है।
इन स्कूलों की बेसिक शिक्षा और समाज कल्याण विभाग में साठगांठ रही। यह घोटाला न सिर्फ छात्रों की फर्जी संख्या दर्शाकर किया गया, बल्कि अस्तित्वहीन विद्यालयों के नाम पर छात्रों को नामांकित दिखाते हुए छात्रवृत्ति की रकम हड़पी गई है। यह फर्जीवाड़ा तत्कालीन लचर व्यवस्था के चलते हुआ।
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छात्रवृत्ति के मामले में पूर्व व्यवस्था के तहत विद्यालय छात्रों की सूची बीएसए दफ्तर पहुंचाते थे। एबीएसए उस सूची का सत्यापन कराते थे। इसके बाद यह सूची समाज कल्याण, पिछड़ा वर्ग व अल्पसंख्यक दफ्तरों को भेजी जाती थी। समाज कल्याण विभाग के सुपरवाइजर इस सूची का अपने स्तर से सत्यापन कराते थे।
उपलब्ध बजट के हिसाब से ये तीनों विभाग विद्यालय प्रबंधक व प्रधानाध्यापक के संयुक्त बैंक खाते में रकम पहुंचा देते थे। बच्चों को छात्रवृत्ति की रकम चेक या कैश के रूप में बांटी जाती थी। इसमें छात्रों को निर्धारित रकम से कम दिए जाने की भी शिकायतें सामने आती थीं। घपले का पूरा खेल सत्यापन में हो जाता था। कर्मचारियों की मानें तो एक ही छात्र को कई विद्यालयों में पंजीकृत दिखाते हुए छात्रवृत्ति हड़प कर ली जाती थी।
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छात्रवृत्ति वितरण में गड़बड़ियों की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए वर्ष 2014 में पीएफएमएस लागू हुआ। इसमें खुद छात्र पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करता है। उसे सात दिन का समय संशोधन के लिए मिलता है। इसके बाद विद्यालय जांच करके लखनऊ एनआईसी पीएफएमएस को आवेदन फारवर्ड करता है। उक्त सिस्टम आवेदन पत्र की विश्वविद्यालय, बोर्ड व राजस्व के लिंक डाटा से रोलनंबर, पंजीयन क्रमांक, आय, जाति आदि से जांच करता है।
सिस्टम चेक हुए डाटा को उक्त तीनों विभागों को भेज देता है। जहां से उसे लॉक करके दोबारा एनआईसी भेज दिया जाता है। इसके बाद सिस्टम ही छात्रों के बैंक खातों में निर्धारित रकम भेज देता है। आवेदन पत्र में छात्रों को आधारकार्ड नंबर देना होता है। इससे एक छात्र के नाम से अन्य विद्यालयों से छात्रवृत्ति नहीं ली जा सकती है।
वर्ष 2008-09 में छात्रवृत्ति घोटाला सामने आने के बाद वर्ष 2012-13 से ई पेमेंट के जरिए छात्रवृत्ति प्रदान की गई। इसमें ट्रेजरी से सीधे बच्चों के बैंक खाते में रकम पहुंचाई जाती थी। इस व्यवस्था में डिमांड व उपलब्ध बजट के सापेक्ष बिल तैयार होता था। जिसे ट्रेजरी भेजा जाता था। इसके बाद से पीएफएमएस लागू हो गया।