ठंड और कोहरे से स्थिति और भी गड़बड़ हुई है। इससे वे ग्रंथियां सुस्त पड़ गई हैं, जो खुशी के हारमोंस का रिसाव करती हैं। जो हारमोंस व्यक्ति का मूड खराब करते हैं, वे शीत लहरी में सक्रिय हो गए हैं। शिविरों में लोगों की काउंसलिंग की गई और जिनके लक्षण अधिक जटिल थे, उनकी दवा की खुराक को दुरुस्त किया गया।
इसके साथ ही रोगियों और उनके परिजनों को खुद की काउंसलिंग के लिए भी कहा गया। इसके साथ ही दवाओं से नियंत्रित रोगी ‘रिलैप्स’ कर गए हैं। उनकी तबीयत बिगड़ गई है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की ओपीडी में अवसाद के रोगियों की संख्या बढ़ गई है।
ये हारमोंस घटे
- एनडोरफीन, डोपामीन, सेरोटोनिन
ये हारमोंस बढ़े
- कार्टीसोल, एडरीनलीन
यह भी होता असर
राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम के पूर्व जिला कोआर्डिनेटर डॉ. एसके निगम का कहना है कि खराब हारमोंस बढ़ने से उदासी, चिड़चिड़ापन तो बढ़ता ही है दवाओं का असर भी कम हो जाता है। इसी वजह से लोगों का ब्लड प्रेशर और डायबिटीज अनियंत्रित होने लगती है। अच्छे हारमोंस से दवाओं का असर बढ़ता है और बीमार की रिकवरी तेज होती है।
धूप न निकलने और ठंड से अवसाद के रोगी बढ़े हैं। रोशनी कम होने से अवसाद की स्थिति बढ़ती है। ओपीडी में अवसाद के रोगियों में 10 फीसदी इजाफा हुआ है। ठंड में नसों में सिकुड़न आती है। इसके साथ ही धूप का न्यूरो केमिकल के रिसाव पर असर आता है।- डॉ. धनंजय चौधरी, विभागाध्यक्ष मनोरोग विभाग, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज