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UP: सेवानिवृत्त DIOS नहीं छोड़ पा रहे कुर्सी का मोह, कार्यकाल में विवादित रहे हैं केके ओझा, जानें पूरा मामला

Fri, 10 May 2024 02:20 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Hamirpur News: गुरुवार दोपहर 12:06 बजे अमर उजाला की टीम को सेवानिवृत्त डीआईओएस अपनी पुरानी कुर्सी में बैठे नजर आए। उन्होंने कहा कि आचार संहिता के चलते कई सारे काम पड़े है, जिन्हें पूरा करने को वह कार्यालय चले आते है।
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कुर्सी पर बैठकर काम करते सेवा निवृत्त डीआईओएस केके ओझा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हमीरपुर जिले में सेवानिवृत्ति के बाद भी तैनात रहे जिला विद्यालय निरीक्षक कुर्सी का मोह नहीं छोड़ पा रहे है। यही कारण है कि वह प्रतिदिन कार्यालय पहुंच अपनी कुर्सी पर बैठ काम करते देखे जा सकते है। वहीं, डीआईओएस का चार्ज पाने वाले जीआईसी के प्रधानाचार्य दूसरी कुर्सी पर बैठकर काम करते है।

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सेवानिवृत्त डीआईओएस आचार संहिता के चलते कई अधूरे काम पूरे करने व नए डीआईओएस को सहयोग करने की बात कह रहे है। जिले में तैनात रहे जिला विद्यालय निरीक्षक केके ओझा बीते 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त हो गए। वह अपने घर जाने की बजाय मुख्यालय में ही रहकर प्रतिदिन कार्यालय पहुंचते है।

वहां वह किसी दूसरे कक्ष में बैठने की बजाय डीआईओएस कार्यालय में अपनी पुरानी कुर्सी पर ही बैठते है। गुरुवार दोपहर 12:06 बजे अमर उजाला की टीम को सेवानिवृत्त डीआईओएस अपनी पुरानी कुर्सी में बैठे नजर आए। उन्होंने कहा कि आचार संहिता के चलते कई सारे काम पड़े है, जिन्हें पूरा करने को वह कार्यालय चले आते है।

मौजूदा डीआईओएस बोले- यह सम्मान की बात है
14 जनपदों में अधिकारी रहे अब कुर्सी का मोह क्यों रहेगा। कहा कि क्लास वन अफसर है क्लास टू अफसर को चार्ज मिला है। ऐसे में वह डीआईओएस की कुर्सी पर बैठ सकते है। गौरतलब हो की केके ओझा के स्थान पर डायरेक्टर स्तर से मुख्यालय स्थित जीआईसी के प्रधानाचार्य पवन कुमार श्रीवास्तव को चार्ज दिया गया, जो अपने कार्यालय में दूसरी कुर्सी डालकर बैठते है। मौजूदा डीआईओएस ने बताया कि यह सम्मान की बात है।
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कार्यकाल में विवादित रहे सेवानिवृत्त डीआईओएस
डीआईओएस केके ओझा अपने कार्यकाल के दौरान काफी विवादित रहे। उन्होंने कुरारा स्थित संस्कृत विद्यालय में अध्यक्ष रहने के दौरान नियम विरुद्ध अपने भाई का संविदा में चयन किया। जिसकी जांच मुख्य विकास अधिकारी को सौंपी गई। जिनके द्वारा पत्रावली सहित आख्या प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। लेकिन मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
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