2007 तक भाजपा जीती नहीं, परिसीमन के बाद से पा रही आधे से ज्यादा वोट
वर्ष 2012 परिसीमन से पहले इस विधानसभा क्षेत्र का अधिकतर इलाका सरसौल विधानसभा में आता था। तब भाजपा 1991 से लेकर 2007 तक के चुनावों में कभी जीत न सकी। परिसीमन बदलने के बाद इस सीट के सियासी समीकरण ऐसे बदले कि 2012 से अबतक हुए तीन विधानसभा चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता सतीश महाना बड़े मार्जिन से ही जीते।
महाना को 61 फीसदी वोट देकर जिता दिया
भाजपा ने वर्ष 2012 के पहले चुनाव में करीब 38 फीसदी वोट हासिल किए। इस चुनाव में बसपा को 24.34 फीसदी वोट मिले थे जबकि सपा को 23 फीसदी मत हासिल हुए। कांग्रेस को महज आठ फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा था। 2017 के चुनाव में जहां सपा और बसपा को करीब सात फीसदी से ज्यादा वोटों का नुकसान उठाना पड़ा। वहीं भाजपा को करीब 18 फीसदी का फायदा हुआ और महाना 55 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल इस सीट से दूसरी बार विधायक बने। 2022 में हुए चुनाव में यहां की जनता से महाना को 61 फीसदी वोट देकर जिता दिया।
लोकसभा में भी कमल ने किया कमाल
विधानसभा की ही तरह लोकसभा चुनाव में भाजपा के कमल ने जबकर वोट बटोरे। 2014 में जहां भाजपा प्रत्याशी देवेन्द्र सिंह भोले ने यहां से अजेय बढ़त बनाई थी। इस बार भी सतीश महाना जिस तरह खुलकर उनका साथ दे रहे हैं, वह उनके लिए कम से कम राहत की बात है। हालांकि सपा प्रत्याशी राजाराम पाल के साथ इस बार कांग्रेस के हाथ का साथ है। ऐसे में वह भी पिछड़े व ग्रामीण इलाकों में किसी कमाल की उम्मीद कर रहे हैं।
बाहर साल बाद भी कई क्षेत्र में नहीं पहुंचा विकास
परिसीमन के बाद बने इस विधानसभाक्षेत्र में सफीपुर, चकेरी, हंसपुरम, आवास विकास, गांधीग्राम, हरजेंदर नगर, सनिगवां, चंदारी, यशोदानगर, बंसत विहार, बिनगवां, जरौली, कर्रही, पशुपतिनगर और नौबस्ता जैसे इलाके आते हैं। क्षेत्र के कई हिस्सों में बारह साल बाद भी विकास पहुंच से दूर है। कुछ इलाकों में जल निगम की लाइन नहीं पहुंची है। गांधीग्राम जैसे इलाके के एक बड़े क्षेत्र में सीवर लाइन ही नहीं पड़ी है। कर्रही बाजार में अतिक्रमण और टूटी सड़कें बड़ी समस्या है।
सवर्ण या दलित बनेंगे जीत के आधार
4.60 लाख मतदाताओं वाली इस विधाानसभा सीट में सबसे ज्यादा 1.46 लाख सवर्ण मतदाता हैं। ये संख्या किसी भी प्रत्याशी को जीत का सेहरा पहनाने के लिए पर्याप्त हैं। हालांकि भाजपा और बसपा दोनों के ही प्रत्याशी सवर्ण हैं, ऐसे में सर्वणों के पास अपनी पसंद का प्रत्याशी चुनने का विकल्प मौजूद है। ,
ओबीसी के करीब 78 हजार मतदाता हैं
करीब 90 हजार दलित मतदाता हैं ,जो परंपरागत तौर पर तो बसपा का वोट कैडर माना जाता है लेकिन देखना यह है कि इस बार इनका झुकाव किस दल की ओर रहेगा। सपा ने इस बार यहांं से पाल बिरादरी के नामी चेहरे पर दांव लगाया है। वहीं, सीट पर ओबीसी के करीब 78 हजार मतदाता हैं, जिनको अपना बनाने और बताने में भाजपा-सपा दोनों ही कोई कसर नहीं छोड़ रही। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है कि ऊंट किस करवट बैठेगा।