चित्रों में दिखाई पड़ते हैं ये चित्रण
मुख्य बात यह है कि यह शैलाश्रय एक चट्टान में पूरे एक साथ सुरक्षित अवस्था में विद्यमान हैं। इन्हें आज भी देखा जा सकता है।यह पूरे शैल चित्र एक साथ एक पूरी पट्टिका में प्रर्दशित हैं। इन चित्रों में विशेष रूप से हिरण, बकरी, धनुषधारी मनुष्य, कुत्ता, गाय, घोड़े का चित्रण दिखलाई पड़ रहा है।
वहीं, दूसरे शिलाखंड में विविध प्रकार के 18 चित्रों का चित्रण किया गया है। इसमें एक साथ तमाम धनुषधारी बाण लिए मनुष्यों के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों का चित्रण है। प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर डॉ. सिंह ने बताया कि चित्रकूट अंचल में मिल रहे शैलाश्रयों में ऐसा दुर्लभ चित्रण नहीं परिलक्षित होता है।
उन्होंने बताया कि भौंरी की काली पाथर पहाड़ी पुरातत्त्व और प्रागैतिहास की दृष्टि से बहुत समृद्धशाली है। धनुष-बाण लिए हुए शिकारियों के साथ जंगली पशुओं और कुछ पालतू पशुओं का गेरुए रंग से चित्रण विशेष रुप से उल्लेखनीय और खूबसूरत है।
1883 में हुई थी पहली बार शैल चित्रों की खोज
बता दें कि सर्वप्रथम 1883 में इतिहासविद काकवर्न ने चित्रकूट के समीपस्थ शैल चित्रों की खोज पहली बार की थी। आर्कियोलॉजी एंड कल्चरल हिस्ट्री ऑफ बांदा डिस्ट्रिक्ट के पेज 61 में डॉ. सीएल दूबे ने चित्रकूट अंचल के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों के बारे में जानकारी दी थी।