यूपी के कानपुर शहर समेत आसपास के कई शहरों में बुधवार को मौसम ने करवट ली है। यहां कानपुर समेत इटावा, औरैया, कन्नौज, हरदोई आदि जिलों में बारिश हुई। वहीं बांदा, फतेहपुर, फर्रूखाबाद, हमीरपुर, जालौन, चित्रकूट, उन्नाव, महोबा आदि जिलों आसमान में बदली छाई रही।
विज्ञापन
2 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
कानपुर में रात के आखिरी पहर में हवाओं के रफ्तार पकड़ने से मंगलवार भोर में कोहरे की चादर घनी हो गई। कंपकंपा देने वाली गलन का माहौल पैदा हुआ। भोर में तनी कोहरे की घनी चादर में दृश्यता 100 मीटर रही लेकिन जैसे ही हल्की धूप खिली और कोहरे की चादर हल्की पड़ी तो दृश्यता ढाई सौ मीटर पर आ गई।
विज्ञापन
3 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) के मौसम विभाग के मुताबिक छह और सात फरवरी को स्थानीय स्तर पर हल्की बारिश का पूर्वानुमान है। मौसम विभाग का कहना है कि मध्य रात्रि के बाद उत्तरी-पश्चिमी हवाओं का रुख उत्तरी-पूर्वी हुआ।
4 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
बदली छाई रहेगी। मंगलवार दिन में उत्तरी पूर्वी हवाओं की गति 2.2 किमी प्रति घंटा रही है लेकिन आधी रात के बाद हवाओं ने तेजी पकड़ी। मौसम विभाग के सीनियर रिसर्च फैलो डॉ. विजय दुबे का कहना है कि इस दौरान बदली छाए रहने का अनुमान है।
विज्ञापन
5 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
बसंत पंचमी तक स्थानीय रूप से लो प्रेशर बनने से बारिश की संभावना है। इसके बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ेगा। मंगलवार को अधिकतम और न्यूनतम दोनों तापमान में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
विज्ञापन
6 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
जनवरी माह की औसत बारिश 15.8 मिमी
- 1974 की जनवरी में बारिश शून्य
- 1980 की जनवरी में बारिश शून्य
- 1993, 97, 98 की जनवरी में बारिश शून्य
- 2001, 06, 07, 08, 09 की जनवरी में बारिश शून्य
- 2011 की जनवरी में बारिश शून्य
विज्ञापन
7 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
दो साल टूटा रिकार्ड
इस दशक में दो सालों की ऐेसी भी जनवरी है जिसमें बारिश ने रिकार्ड तोड़ा। वर्ष 1996 में 136.4 मिमी बारिश जनवरी में हुई और वर्ष 2014 में हुदहुद तूफान आया, जिससे 105.8 मिमी बारिश हुई। 90 और वर्ष 2000 के दशक के सालों में जनवरी में मौसम के इस मिजाज को ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव माना जा रहा है। मौसम विभाग के सीनियर रिसर्च फैलो डॉ. विजय दुबे का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग का यही प्रभाव होता है। कभी किसी जगह पर इकट्ठा पानी गिरता है और कहीं सूखा पड़ जाता है। ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से यह स्थिति आगे भी रह सकती है।
8 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर
बढ़ रहा जाड़े की बारिश का ग्राफ
ग्लोबल वार्मिंग की वजह से मौसम में आए बदलाव में जाड़े की बारिश का ग्राफ बढ़ रहा है। मौसम विज्ञानियों का कहना है कि बारिश लोकलाइज हो गई है। अब एक वृहत क्षेत्र में एक साथ और एक रफ्तार की बारिश नहीं होती। लेकिन पश्चिमी विक्षोभ के बदलाव की वजह जाड़े में अधिक बारिश हो रही है। 1971 से 80 के बीच 30.1 मिमी, 81 से 90 के बीच 31 मिमी बारिश हुई। वर्ष 91 से 2000 के बीच 31 मिमी बारिश हुई। वर्ष 2001 और 10 के बीच ग्राफ थोड़ा नीचे 23.5 मिमी तक आया लेकिन वर्ष 2011 के बाद बढ़ गया। इन सालों में 57.7 मिमी औसत बारिश हुई।