सेंट्रल की चाइल्डलाइन पर ताला, सेंट्रल पर घूम रहे बच्चे
रेलवे चाइल्डलाइन बंद होने के बाद रेलवे स्टेशन पर बच्चों की देखरेख करने और उन्हें प्रक्रिया के तहत बाल संरक्षण गृह में दाखिल कराने वाली कोई वैकल्पिक संस्था नहीं है। यह काम जीआरपी और आरपीएफ की संयुक्त टीम कर रही है।
हालांकि यह नाकाफी है, क्योंकि जीआरपी-आरपीएफ दूसरे कामों में व्यस्त रहती है, जबकि चाइल्डलाइन खासकर इसीलिए 24 घंटे के लिए तैनात होती है। कानपुर सेंट्रल पर चाइल्डलाइन की 12 महिलाएं और पुरुष काम करते थे, जो किसी बच्चे को अकेला रोते हुए देखकर।
किसी ट्रेन में छूट जाने की सूचना पर या किसी व्यक्ति या गिरोह के पास संदिग्ध अवस्था में होने पर तत्काल जीआरपी की मदद से उन्हें बचाने का काम करते हैं। चाइल्डलाइन सदस्यों के न होने से इन दिनों बच्चे अकेले इधर-उधर घूमते दिख रहे हैं।
यह होता है चाइल्डलाइन का काम
कानपुर सेंट्रल पर मिले बच्चों को कल्याणपुर में बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया जाता है। उसके आदेश पर 10 साल से छोटे बच्चों को चिल्ड्रन होम में रखा जाता है। 10 साल से अधिक उम्र के लड़कों को कल्याणपुर के राजकीय बाल गृह और लड़कियों को स्वरूप नगर में राजकीय बालिका गृह में रखा जाता है।
सुभाष चिल्ड्रन सोसाइटी की मान्यता निलंबित होने पर किदवई नगर में सुभाष चिल्ड्रेन होम बंद है। ऐसे में अब 10 साल से कम उम्र के बच्चों के रेलवे स्टेशन पर मिलने पर उन्हें लखनऊ के चिल्ड्रन होम ले जाया जा रहा है। चाइल्डलाइन के न होने से अब यह काम जीआरपी कर रही है।
रेलवे चाइल्डलाइन को चलाने वाली संस्था पर कार्रवाई होने से वह बंद चल रही है। रेलवे परिसर में रेलवे पुलिस किसी खोए हुए या लावारिस बच्चों के मिलने पर उन्हें बाल कल्याण समिति के माध्यम से बाल-बालिका गृह में भेज रही है। -जयदीप सिंह, जिला प्रोबेशन अधिकारी
चाइल्डलाइन अभी काम नहीं कर रही है। चाइल्डलाइन की सूचना पर जीआरपी को सहयोग मिल जाता है लेकिन पहले भी जीआरपी के माध्यम से ही बच्चों को समिति के समक्ष पेश किया जाता था। इसके लिए टीम भी बनाई गई है। -आरके द्विवेदी, थाना प्रभारी, जीआरपी, कानपुर सेंट्रल