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कानपुर: सीएसए में रैगिंग के लिए जूनियर छात्रों पर हमला, छात्रावास पर बरसाए पत्थर

Wed, 07 Aug 2019 09:36 PM IST
शिखा पांडेय यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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सीएसए कानपुर - फोटो : अमर उजाला
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कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) में मंगलवार आधी रात रैगिंग के लिए आए सीनियर छात्रों ने जूनियर छात्रों के हॉस्टल पर पथराव कर दिया। जूनियर छात्रों ने बताया कि सीनियर छात्र लोहे की रॉड, लाठी-डंडे लिए थे। सीनियरों ने गेट का ताला तोड़ने की कोशिश की पर गनीमत रही कि ताला नहीं टूटा। हर साल सीनियर इसी तरह रैगिंग करते हैं।
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मंगलवार रात को आरएसआरबी छात्रावास पर दो दर्जन से अधिक छात्रों ने पथराव कर दिया। खिड़कियों पर पत्थर बरसाए। नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बीएससी प्रथम वर्ष के छात्रों ने बताया कि बवाली सीनियर्स गेट को बार-बार पीटकर हम लोगों को बाहर आने के लिए बोल रहे थे। भद्दी-भद्दी गालियां दे रहे थे। बवाली छात्रों को देख सिक्योरिटी गार्ड भी भाग खड़ा हुआ। बाद में मौके पर पुलिस पहुंची तब जाकर बवाली भाग खड़े हुए।

शिक्षक इसे मानते हैं परंपरा 
विश्वविद्यालय में जूनियर छात्रों पर हमला कोई पहली बार नहीं हुआ है। यहां हर साल ऐसी वारदात होती रहती है। हैरानी की बात है कि यहां के कुछ बेपरवाह शिक्षक इसे विश्वविद्यालय की परंपरा बताने में शर्म भी नहीं करते। हंसते हुए कहते हैं कि यह तो चलता रहता है।

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महीनों अटकी रहती है जांच 
पिछले साल हुई घटना की जांच में हुई लापरवाही इस बात का सबूत है कि इस बार भी विश्वविद्यालय प्रशासन मामले की जांच का ढोंग रचाएगा। पिछले साल भी कुछ इसी तरह जूनियर छात्रों पर सीनियर छात्रों ने हमला कर दिया था। घटना के दिन विश्वविद्यालय के जिम्मेदार अफसरों ने मीडिया में झूठा बयान जारी किया था। बताया कि पहले ही दिन से जांच शुरू हो गई लेकिन हकीकत में सप्ताह भर बाद जांच कमेटी का गठन हुआ था। जांच कमेटी का कोई सदस्य कभी छुट्टी पर रहता है तो कई दिन तक खुद चेयरमैन गायब हो जाते हैं। इस तरह से जो जांच तीन दिनों में होनी चाहिए वह तीन माह में भी पूरी नहीं होती।

सियासी लाभ के लिए शिक्षक करवाते बवाल
विश्वविद्यालय के एक सीनियर प्रोफेसर की मानें तो विश्वविद्यालय में छात्रों का हर बवाल प्रायोजित होता है। यहां जाति, धर्म के नाम पर शिक्षकों के कई गुट बंटे हुए हैं। आपसी खुन्नस के चलते शिक्षक इस तरह के बवाल कराते रहते हैं। सभी किसी न किसी तरह कृषि एवं कृषि शिक्षा मंत्री व राज्यमंत्री के संपर्क में होते हैं जिनके आगे विश्वविद्यालय प्रशासन बेबस हो जाता है। ये शिक्षक हर चीज में मंत्रालय से सिफारिश करवाते हैं और मंत्रालय भी बिना सोचे-समझे इनकी सिफारिश कर देता है।

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