कानपुर देहात के पुखरायां में राष्ट्रपति ने संबोधन के दौरान एक ऐसा वाकया बताया, जिस पर खूब ठहाके लगे। राष्ट्रपति ने कहा कि एक मेरे अधिवक्ता दोस्त हैं दिग्विजय सिंह। 24 घंटे पहले मुझसे मिलने की इच्छा जता पत्र भेजा। मैंने मिलने की हामी भरी। जैसे ही वो मिले, मैंने पूछा कि अभी तक कहां सो रहे थे।
तुम्हारा पत्र तो बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था। इस पर हर कोई हंसने लगा तो राष्ट्रपति भी मुस्कुराए। राष्ट्रपति ने आगे बताया, दरअसल दिग्विजय ने कहा कि मुझे लगा कि आप राष्ट्रपति बन चुके हो, तो शायद पहचानोगे नहीं। इसलिए पहले पत्र नहीं भेजा था। मगर जब आप यहां आए तो मुझसे रहा नहीं गया और मैंने मिलने की इच्छा जताई। राष्ट्रपति ने कहा, मैं जैसा पहले था, वैसा आज भी हूं।
कोविंद ने अपने पैतृक गांव पर परौंख में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि मुझे पांच लाख प्रतिमाह तनख्वाह मिलती है। जिसमें पौने तीन लाख टैक्स कट जाता है। हमसे ज्यादा तो हमारे टीचरों और अधिकारियों को मिलता है।
देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर हूं। उसकी कुछ जिम्मेदारियां और प्रोटोकॉल है, जिसे निभाना पड़ता है। आज जिस संवैधानिक पद पर हूं, मैंने कभी इसकी कल्पना नहीं की थी। ये कानपुर देहात के वासियों का आशीर्वाद है, जो मैं यहां तक पहुंचा। ये हमारे लोकतंत्र की आदर्श व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि पहनावा, उतार-चढ़ाव आदि पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इसे लेकर मैंने कइयों को भटकते देखता है।
दो घंटे में खर्च होते हैं 18-20 लाख
राष्ट्रपति ने बताया, पुखरायां के लोग कहते हैं एक-दो घंटे के लिए कभी भी आ सकते हैं। इससे एक बात साफ है कि ये लोग आत्मीयता से जुड़े हैं। मगर ये संभव नहीं हो पाता। इसके पीछे उन्होंने एक बड़ा कारण बताया। कहा कि राष्ट्रपति के दौरे के खर्च का एक अनुमान है।
इसके मुताबिक दो घंटे में तकरीबन 18-20 लाख रुपये खर्च होते हैं। जितने ज्यादा दौरे होंगे, उतने अधिक पैसे खर्च होंगे। ये पैसा आपके ही टैक्स का है। इसलिए मेरे हिसाब से टेलीफोन पर बातचीत करना काफी है। पत्र भेजकर शुभकामनाएं देना मुझे पसंद है। यही बेहतर भी है।