राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हुई। बाल सखा ठाकुर जसवंत सिंह से उनकी गहरी दोस्ती थी। रामनाथ कोविंद स्कूल जाते समय रास्ते में बालसखा के घर के बाहर रुककर आवाज लगाते। वहां से दोनों साथ में स्कूल जाते। लंच होने पर दोनों नजदीक के बाग में जाकर बैठते और मां के हाथों से दी गई कपड़े की पोटली में बंधा गुड-रोटी मिल बांटकर खाते।
यादें ताजा करते हुए परौंख निवासी बाल सखा ठाकुर जसवंत सिंह ने कहा कि राष्ट्रपति बचपन से ही बेहद सौम्य व कम बोलने वाले रहे। वर्ष 1951 में परौंख में राम मनोहर लोहिया आए थे। उस समय दोनों लोग कक्षा दो में पढ़ते थे। पड़ोसी होने के चलते बचपन से हम दोनों में अच्छी दोस्ती रही। एक साथ ही स्कूल जाते थे।
जूनियर स्कूल छह किमी दूर खानपुर में था। दोपहर का भोजन दोनों ले जाते थे। इसमें अचार-पराठा, रोटी-गुड़ या कभी कभी भरवां मिर्च के साथ रोटी होती थी। स्कूल में भोजन वेला की छुट्टी होती तो नजदीक ही राजेंद्र प्रसाद के बाग के पास बने पक्के कुएं के चबूतरे पर बैठकर भोजन करते। इस दौरान मनपसंद पराठा या फिर मिर्च अचार बांट कर खाते थे।
गांव से स्कूल जाने के लिए पगडंडी थी। कई बार तेज धूप होती तो रास्ते में लगे आम के पेड़ की छांव में सुस्ता लेते। उन्होंने बताया कि कक्षा आठ की परीक्षा के समय बाल सखा ने मन लगाकर पढ़ने की नसीहत दी थी। इस पर उन्होंने गुस्से में कह दिया था कि तुम पढ़ लिखकर डीएम बन जाना, मुझे खेती करनी है। वह डीएम से आगे निकलकर राष्ट्रपति बन गए हैं। इससे बेहद प्रसन्नता होती है।
दान कर दिए थे उपहार
वर्ष 2001 में राज्यसभा सदस्य बनने पर गांव आने पर सांसद रामनाथ कोविंद का भव्य स्वागत हुआ था। गांव के लोगों ने उन्हें 11 चांदी के मुकुट व रुपयों के हार पहनाए थे। जसवंत ने बताया कि स्वागत के बाद बाल सखा ने सारे उपहार व चांदी के मुकुट उन्हें सौंप दिए। उन्होंने कहा कि रुपये व उपहार से तुम गरीब बेटियों की शादी में मदद करना।