ठीक हो जाएगा, काउंसलिंग करेंगे। इसके साथ ही दवा भी देंगे। परचा लेकर रजनी मोहित को लेकर चली गईं। इसके बाद एक और रोगी आया। वह तीसरी बार ओपीडी में दिखाने आया था। 22 साल का राजेश बाहर से आने के बाद कपड़े उतार कर फेंक देता है। नहाता है, फिर दूसरे कपड़े पहन लेता है।
पहले वाले कपड़े छूने से डरता है। कोरोना काल की एहतियात अब उसकी बीमारी हो गई है। उसके साथ आए बड़े भाई आशुतोष ने बताया कि दवा से कुछ असर तो पड़ा है। बाहर से पहनकर आने वाले कपड़े उतारने के बाद अब बिदकता नहीं है। बाद में राजेश से पूछा तो कहने लगा कि बाहर पहन कर गए कपड़ों में लगता है कि कुछ लग गया है। कोरोना के संक्रमण का भी शक रहता है। अगर कपड़े न बदलें तो उलझन रहती है और रात में नींद नहीं आती।
हर ओपीडी में आते हैं औसत आठ रोगी
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. गणेश शंकर ने बताया कि कोरोना काल के बाद ओसीडी के रोगी बढ़े हैं। हर ओपीडी में औसत आठ रोगी आते हैं। उन्होंने बताया कि ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिस्ऑर्डर के रोगी बहुत तकलीफ में रहते हैं। उन्हें अपनी आदतों का पता रहता है। उस आदत से वे घबराते भी हैं, लेकिन वही हरकत बार-बार करने को मजबूर भी रहते हैं। काउंसलिंग करने और दवा के इस्तेमाल से वे ठीक हो जाते हैं। रोगियों की हरकत से उनके घरवाले भी परेशान होते हैं। लॉकडाउन के बाद सबसे अधिक रोगी ओसीडी के आ रहे हैं। इसके अलावा डिप्रेशन के रोगियों में भी इजाफा हो गया है।
ये करें
- रोगियों को डांटें या झिड़कें नहीं
- उनसे प्रेम पूर्वक व्यवहार करें
- घरवाले उन्हें आदत के संबंध में समझाएं
- डॉक्टर की सलाह को मानने के लिए आश्वस्त करें
- रोगियों का सामाजिक दायरा बढ़वाएं
- दूसरे कार्यों में उसे व्यस्त रखें