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Kanpur News: धान का रकबा घटा, फिर भी बढ़ी 46 फीसदी यूरिया की खपत

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इटावा। सहकारी समितियों से मिलने वाली यूरिया खाद आखिर कहां जा रही है? कृषि विभाग दावा कर रहा है कि जिले में पिछले चार महीनों में यूरिया की खपत में 46 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसकी वजह यह है कि किसान अधिक मात्रा में खाद का उपयोग कर रहे हैं। स्टॉक भी कर रहे हैं। वहीं किसान कह रहे हैं कि उन्हें यूरिया समय से उपयुक्त मात्रा में मिल ही नहीं रही है। उधर, सरकार ने यूरिया की जमाखोरी और कालाबाजारी की आशंका जताते हुए जांच के आदेश दिए हैं।
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कृषि विभाग की ओर से जिले में प्राकृतिक खेती पर जोर के बीच अचानक यूरिया की खपत में वृद्धि हुई है। खरीफ सीजन को शुरू हुए चार माह बीते हैं लेकिन लक्ष्य के मुकाबले 46 फीसदी अधिक यूरिया की बिक्री हो चुकी है। बीते वर्ष 31 जुलाई तक जिले में 6,849 एमटी खाद का वितरण हुआ था, जबकि इस बार इस तिथि तक जिले में 12,913 एमटी खाद का वितरण किया गया है।
वहीं, बीते वर्ष जिले में धान का रकबा 74,183 हेक्टेयर था, जो इस बार घटकर 66,750 हेक्टेयर रह गया है। धान के रकबे में कमी होने के बाद भी यूरिया की खपत में बढ़ोतरी होना चिंता का विषय बन गई है। यह आंकड़ा तो रोपाई के समय का है। अभी धान में कई बार खाद डाली जानी है। इसके बाद यूरिया की खपत के आंकड़े दोगुने हो जाएंगे।
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यूरिया की खपत में मंडल में छठवें स्थान पर जिला

कानपुर मंडल में यूरिया की सर्वाधिक खपत करने में पहले स्थान पर कन्नौज, दूसरे स्थान पर कानपुर देहात, तीसरे पर फर्रुखाबाद, चौथे नंबर पर कानपुर, पांचवें पर औरैया और छठे पर इटावा है। हर वर्ष धान के रकबे की अपेक्षा यूरिया खाद की खपत बढ़ रही है।


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6,064 मीट्रिक टन ज्यादा यूरिया खेतों में डाली

पिछले साल अप्रैल से जुलाई तक 6849 मीट्रिक टन खाद की बिक्री हुई थी। वर्ष 2025 में शासन की ओर से धान का रकबे का लक्ष्य घटाकर 66,750 हेक्टेयर कर दिया था, जबकि बीते वर्ष 74,183 हेक्टेयर क्षेत्र में धान की रोपाई की गई थी। इस बार बीते वर्ष के मुकाबले रकबा 7,433 हेक्टेयर घटा है। रकबा घटने के बाद भी पिछले वर्ष की तुलना में जिले में 6,064 मीट्रिक टन ज्यादा यूरिया किसानों ने खेतों में डाल दी।


दुकानदारों की जांच में जुटा विभाग

अभी किसानों ने पहली बार यूरिया खेतों में डाली है। एक माह बाद दोबारा खाद डालने पर आंकड़ा दोगुना हो जाएगा। ये आंकड़े खाद की कालाबाजारी की तरफ भी इशारा करते हैं। कृषि विभाग के अधिकारी धान का मौसम अनुकूल रहने को रकबा बढ़ने का प्रमुख कारण बता रहे हैं। इसके अलावा किसानों की ओर से जरूरत से अधिक खाद खरीदना भी एक वजह है। अब कृषि विभाग अधिक यूरिया खाद खरीदने किसान व बिक्री करने वाले दुकानदारों की जांच कर रहा है।


भरपूर खाद का दावा, किसान कह रहे केवल दिखावा


फोटो 23::महेश।



फोटो 24::धीरेंद्र।

फोटो 25::बृजेंद्र।



फोटो 26::राजेश यादव।

- समितियों पर नहीं मिल रही खाद, निजी दुकानों पर महंगे दामों में खरीद रहे



संवाद न्यूज एजेंसी

इटावा। प्रशासन का दावा है कि जिले में भरपूर मात्रा में खाद मौजूद है। समितियों में खाद भेजी जा रही है लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। समितियों में खाद पाने के लिए किसान परेशान हैं। समितियों की ओर से केवल पंजीकृत किसानों को खाद दी जा रही है, ऐसे में अपंजीकृत किसान निजी दुकानों से महंगे दामों में खाद खरीद रहे हैं।
कृषि विभाग के अभिलेखों में जिले में 2.85 लाख किसान पंजीकृत हैं लेकिन समितियों में 1.45 लाख किसान पंजीकृत हैं। इनमें से सिर्फ 1.15 लाख किसान सक्रिय हैं। जिले की 50 समितियों से इन्हीं सक्रिय किसानों को खाद दी जा रही है, जबकि बचे 1.40 लाख किसान निजी दुकानों से खाद खरीद रहे हैं।
खाद के थोक विक्रेताओं पर प्रशासन लगाम नहीं कस पा रहा है। इसके चलते थोक कारोबारी मनमाने दाम पर टैगिंग के साथ फुटकर विक्रेताओं को खाद की आपूर्ति कर रहे हैं। विवश होकर फुटकर दुकानदारों को भी किसानों को इसी दर पर टैगिंग के साथ महंगी खाद बेचनी पड़ रही है।

शिकायत होने पर कार्रवाई का शिकंजा सिर्फ फुटकर विक्रेताओं पर कसता है, जबकि थोक कारोबारी बच निकलते हैं। निजी थोक विक्रेता अपने यहां फुटकर विक्रेताओं को यूरिया के साथ जिंक सल्फर खरीदने के लिए विवश करते हैं। मनमाने दाम पर जब उन्हें जिंक खरीदने पर यूरिया दी जाती है तो वह भी किसानों से उसकी भरपाई करते हैं। यूरिया खाद की एक बाेरी का मूल्य 266 रुपये 50 पैसे है लेकिन निजी दुकानदार इसे 300 रुपये प्रति बोरी की दर से बेचते हैं। साथ ही यूरिया की बोरी खरीदने पर 100 से 150 रुपये की जिंक को भी लेना मजबूरी होता है।


किसानों की बात



दो दिन से मायूस लौट रहे किसान

फोटो 23::महेश।



1- भरथना समिति पर खाद लेने पहुंचे चलनिया गांव निवासी किसान महेश ने बताया कि लगभग 20 बीघा खेत में धान की फसल के लिए यूरिया की जरूरत है। पहले भी दो बार यूरिया लेने के लिए समिति पर आया था। आज भी मायूस होकर लौटना पड़ रहा है। निजी दुकानदार खाद के साथ अन्य उर्वरकों को खरीदने के लिए विवश करते हैं।

फोटो 24::धीरेंद्र।

दुकानों से खरीदना होगा जिंक और खाद



2- पाली गांव निवासी किसान धीरेंद्र ने बताया कि खेत में धान की फसल है। डीएपी की जरूरत है मगर डीएपी नहीं मिलने से परेशान हैं। कई बार पूछने आया लेकिन डीएपी अब तब नहीं आई। मजबूरी में निजी दुकान से खाद खरीदनी पड़ेगी। निजी दुकानों पर जिंक का पैकेट लेना पड़ेगा।

फोटो 25::बृजेंद्र।


मजबूरी में खरीदनी पड़ी महंगी खाद



3- चकरनगर के किसान ब्रजेंद्र ने बताया वह दो बार संघ के चक्कर लगा चुके है लेकिन हर बार जवाब मिलता है कि खाद नहीं आई है। मजबूरन 1450 रुपये में एक बोरी डीएपी खरीदनी पड़ी, जबकि सरकारी दर 1350 रुपये है। निजी दुकानदारों की मनमानी पर अधिकारी लगाम नहीं लगा पा रहे हैं।


नहीं होती कोई सुनवाई



फोटो 26::राजेश यादव।

4- किसान राजेश यादव ने कहा सरकार सिर्फ खाद होने की घोषणा करती है। सरकारी समितियों में किसान परेशान होता है, जमीनी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं है। खाद के बिना हम कैसे समय से खेती करें? यह जिम्मेदारी किसकी है? अधिकारियों को सोचना चाहिए कि दावों की खाद से खेती कैसे होगी?


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नहीं है खाद की कमी


जिले में खाद की कमी नहीं है, निजी दुकानदार अगर टैगिंग के साथ खाद की बिक्री कर रहे हैं तो गलत है। टीम बनाकर निगरानी की जा रही है। जो दुकानदार टैगिंग के साथ कीमतें अधिक ले रहे हैं उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। किसान सीधे कार्यालय में आकर शिकायत दर्ज करवा सकता है, उसका नाम गोपनीय रखा जा सकता है।

- ओंकार सिंह, जिला कृषि अधिकारी



जरूरत के हिसाब से लें खाद

समितियों में पंजीकृत किसानों को खाद दी जा रही है। सभी समितियों में पर्याप्त मात्रा में खाद है। बुधवार को एक रैक और आ गई है उसे भी समितियों में भेजा जा रहा है। खाद की कमी नहीं है। किसानों से अनुरोध है कि जरूरत के हिसाब से खाद लें, स्टॉक न करें। - कमलेश नारायण वर्मा, एआर कोऑपरेटिव
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