प्रवासी कामगारों को लेकर शुक्रवार को दो श्रमिक स्पेशल ट्रेनें उरई स्टेशन पहुंचीं। दोनों ट्रेनों से उतरे प्रवासियों की थर्मल स्क्रीनिंग की गई और समाजसेवियों ने उन्हें फल, बिस्कुट, दूध बांटा। इसके बाद परिवहन विभाग की दस बसों से उन्हें गंतव्य की ओर रवाना किया गया। जबकि विभाग की ओर से यात्रियों के लिए 25 बसें लगाई गई थी।
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ओखा से जौनपुर जाने वाली श्रमिक स्पेशल ट्रेन शुक्रवार की दोपहर 12.44 बजे पहुंची। इस ट्रेन से 318 वयस्क और 23 बच्चों समेत 341 यात्री उतरे। जबकि मंगलुरू (कर्नाटक) से लखनऊ जा रही श्रमिक स्पेशल ट्रेन 2.24 बजे स्टेशन पहुंची। इस ट्रेन से कुल 13 यात्री उतरे।
इस दौरान तहसीलदार कर्मवीर सिंह, जीआरपी इंस्पेक्टर ब्रजमोहन सैनी, आरपीएफ इंस्पेक्टर राजीव उपाध्याय, महिला थानाध्यक्ष नीलेश कुमारी, सीसीआई अनूप सक्सेना, सीटीआई डा. आरके शाक्या, स्टेशन अधीक्षक एपी वर्मा की मौजूदगी में सभी यात्रियों को लाइन में लगाकर बाहर निकाला गया और सभी यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग की गई।।
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सभी की हुई जांच
- फोटो : amar ujala
संस्कार ग्रामोत्थान संस्था, कुलदीप व रेलवे कर्मचारियों ने यात्रियों को फल, बिस्कुट, दूध, लंच पैकेट व पानी के पाउच दिए। एआरएम केएन चौधरी के मुताबिक, इस ट्रेन में जिले के अलावा हमीरपुर, महोबा, बांदा आदि के यात्री थे। जिन्हें दस बसों से उनके गंतव्य की ओर रवाना किया गया।
बिना सब्जी के दे दी पूड़ी
गोरा भूपका निवासी छोटी बहू बताती हैं कि वह पांच परिजनों के साथ ओखा से लौट रही हैं। बस में पानी मिला था और ट्रेन में पूड़ी दी गई थी पर बिना सब्जी के। पूड़ी के साथ एक हरी मिर्च मिली थी। जबकि झांसी स्टेशन पर पानी की बोतल दी गई थी।
ललितपुर जाने में होगी परेशानी
ललितपुर के सियाराम का कहना है कि उनके साथ एक दर्जन लोग हैं, जिन्हें ललितपुर जाना है। प्रशासन को चाहिए था कि ललितपुर तक ट्रेन का इंतजाम करते। अब यहां से ललितपुर जाएंगे, चार पांच घंटे लगेंगे। रास्ते में परेशानी होगी, वह अलग है।
तीन दिन में मिला एक बार खाना
गलौर से लखनऊ जा रहे दिलशाद ने बताया कि उन्हें 960 रुपये का टिकट दिया गया और एक हजार रुपये वसूले गए। 13 मई की दोपहर चले थे। रास्ते में एक बार ही खाना दिया गया। आज तीसरा दिन है। यहां तक का सफर बासा खाना खाकर काटा।
तिरंगे को हाथों में थाम चल दिए घर को
रंगौली बांदा निवासी मोहन हाथ में तिरंगा झंडा लेकर स्टेशन पर आ रहे थे। पूछने पर बताते है कि वह ओखा में मछुवारे का काम करते हैं। कई बार अपने दर्जन भर साथियों के साथ घर आने की कोशिश की लेकिन हर बार पुलिस ने लौटा दिया गया। लाकडाउन में काम धंधा भी बंद हो गया था। प्रशासन की ओर से जो खाने पीने का इंतजाम किया था, वह नाकाफी साबित हो रहा था।
कई बार एक वक्त का ही खाना मिल पाता था। ऐसे में तय कर लिया था कि अब चाहे जो हो जाए घर जाएंगे, यदि घर न आ पाते तो बिना कोरोना के भूखे ही मर जाते। फिर हाथ में तिरंगा झंडा लिया और अपने साथियों के साथ घर से निकल लिए। इसी बीच पता चला कि उनके इलाके के लिए ट्रेन जा रही है, तो वह स्टेशन आ गए। हाथ में तिरंगा लिए थे तो किसी ने नहीं रोका। स्टेशन आए और टिकट लिया ट्रेन पकड़ी और यहां तक आ गए।