ओमिक्रॉन के रूप में कोरोना की तीसरी लहर का संभावित खतरा बताया जा रहा है, लेकिन जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में डॉक्टरों का टोटा है। हैलट और संबद्ध अस्पतालों में औसत 1800 रोगी रहते हैं, लेकिन इनका इलाज करने के लिए डॉक्टर नहीं हैं। जूनियर रेजीडेंट-1 का पहला बैच आने में देर होने से कॉलेज के पास डॉक्टरों की संख्या घट गई है।
इस संबंध में मेडिकल कॉलेज प्रबंधन ने शासन को भी अवगत करा दिया। इस पर शासन ने स्टाफ को लेकर दोबारा प्रस्ताव मांगा है। मंगलवार को इस संबंध में शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। जनवरी में अगर कोरोना की तीसरी लहर आती है तो मेडिकल कॉलेज अधिक रोगियों के इलाज की व्यवस्था करने की स्थिति में नहीं है।
इस वक्त कॉलेज के अस्पताल में 40 नॉन पीजी जेआर काम कर रहे हैं। इसके अलावा इंटर्न छात्र हैं। इंटर्न छात्रों और नॉन पीजी जूनियर रेजीडेंट के भरोसे व्यवस्था नहीं संभाली जा सकती है। न्यूरो साइंसेज और मैटरनिटी विंग के तीन तलों के वार्डों के लिए डॉक्टर कम पड़ जाएंगे। स्थिति के मद्देनजर कॉलेज प्रबंधन ने हाथ खड़े कर दिए हैं।
इसके अलावा कोरोना की पहली और दूसरी लहर में आउटसोर्सिंग से लिया गया डेढ़ सौ पैरा मेडिकल स्टाफ भी हटा दिया गया है। शासन ने कॉलेज प्रबंधन से स्टाफ के संबंध में प्रस्ताव मांगा है। हालांकि इसके पहले तीन बार प्रस्ताव भेजा जा चुका है। इस संबंध में जीएसवीएम मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. संजय काला ने बताया कि शासन को स्टाफ के संबंध में प्रस्ताव भेज दिया गया है।