कानपुर देहात। अकबरपुर की ऐतिहासिक रामलीला में पीढ़ी-दर-पीढ़ी अभिनय की परंपरा जीवंत हो रही है। चौथी पीढ़ी मंच पर रामलीला की बागडोर संभाले है। रामलीला की शुरुआत में पं. कृष्णाराम द्विवेदी हनुमान बनते थे। दशमी को युद्ध की लीला में वह एक कंधे पर श्रीराम व दूसरे कंधे पर लक्ष्मण को बैठा लेते थे। अब तीसरी पीढ़ी में उनके पौत्र व चौथी पीढ़ी में प्रपौत्र रामलीला मंचन से जुड़ गए हैं।
अकबरपुर की रामलीला 156वें साल में पहुंच गई है। पीढ़ियों से चली आ रही रामलीला सांस्कृतिक परंपरा का गवाह बनी है। कला-साधना दिखाती है कि डिजिटल युग में भी नई पीढ़ी सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़ी हुई है। संवाद अदायगी से लेकर वेशभूषा तक में पुरानी परंपरा और नए समय के समर्पण का मिला-जुला रूप देखने को मिल रहा है। रामलीला मंचन में एक परिवार ऐसा रचा बसा कि अब चौथी पीढ़ी में अभिनय जारी है। शंकर दयाल नगर निवासी पं. ब्रह्म कुमार द्विवेदी कहते हैं कि उनका परिवार श्रीराम की लीला में रचा बसा है।
रामलीला की शुरुआत ककुआ शुक्ला ने की थी। तब दादा पं. कृष्णाराम द्विवेदी हनुमान बनते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि वह युद्ध की लीला में श्रीराम व लक्ष्मण को कंधे पर बैठा लिया करते थे। पिता जी पं. शिवनाथ द्विवेदी उर्फ सुधाकर ने भी रामलीला मंचन जारी रखा। वह रावण, परशुराम के साथ अन्य किरदार भी निभाते थे। उनसे विरासत में रामलीला मंचन मिला। मैंने जनक की भूमिका अर्से तक निभाई।
तबला वादन भी किया। अब टीका कहता हूं। छोटा भाई पं. राजन द्विवेदी रावण बनते हैं। भतीजा पं. अंकुर द्विवेदी ताड़का की भूमिका निभा रहे हैं। पिता जी के नाम पर जनकपुरी मैदान में मंच बना है।र