इटावा/चकरनगर। हरौली बहादुरपुर गांव में बीती 30 जुलाई को बाढ़ का पानी पहुंचा था। इसके बाद कई परिवार अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर हो गए थे। गांव से बाहर खेतों में तंबू लगाकर जीवन यापन कर रहे हैं। पानी उतरने के बाद कई परिवार घरों की ओर लौट आए हैं लेकिन पांच दिन बाद भी मंगलवार दोपहर तक इन परिवारों के पास राशन नहीं पहुंच सका था। आलम यह है कि घरों में आटा खत्म हो चुका है। चावल भी समाप्त होने की कगार पर है। ऐसे में भूखे पेट सोने को परिवार मजबूर हैं।
हरौली बहादुरपुर गांव के बाहर किरन देवी दोपहर करीब डेढ़ बजे गांव के बाहर खेत में लगाए तंबू में बैठी थीं। उनके बच्चे अनामिका (10) और मोहित (12) एक ही थाली में चावल खा रहे थे। किरन ने बताया कि रविवार को आटा खत्म हो गया था। तब से चावल खाकर ही गुजारा कर रहे हैं। अब चावल भी समाप्त हो गए हैं। बताया कि छह लोगों के परिवार में दो थाली चावल पता भी नहीं चले। बेटी पूनम, बेटे विनीश को गांव में पड़ोस के लोगों से आटा लेने के लिए भेजा है। यदि मिल गया तो ठीक है वरना रात कैसे कटेगी अभी यह पता नहीं। चार दिन से आधे पेट ही खाना खाकर सभी सो रहे हैं। बताया कि प्रशासन की ओर से जल्द राशन देने का दावा किया जा रहा है लेकिन हमें अभी तक नहीं मिल सका है।
कुछ दूरी तंबू के पास गांव के रास्ते पर वृद्ध तुलाराम (65) दर्द से कराह रहे थे। बोले पूरे पैर कीचड़ से गल गए हैं। दर्द से जान जा रही है। डाॅक्टर के गांव में आवे की जानकारी मिली थी इसलिए तंबू से नीचे उतर आए थे। पर यहां पता चला कि पशुओं की दवा डॉक्टर दे रहे हैं। लेखपाल लाई, चना, राशन दे गओ पर यहां बनान की व्यवस्था नहीं है। बारिश के बीच चूल्हा जलई न पाए रहो। पास ऊपर बने तंबू में आनंद कुमार, सत्यभान, राम शंकर, राम सिंह, लज्जाराम, रामदास, रवि कुमार, अरविंद, राम नरेश का परिवार जीवन काट रहा है। तंबू में ही रह रहे छोटे लाल कहते हैं बेटी को बुखार चढ़ा है। गांव में एक झोलाछाप से दवा ले ली, आराम नहीं मिला।
तंबू में रह रहे रामशंकर ने बताया पानी की बड़ी किल्लत है। यमुना में गांव के नल, समर डूब गई। इससे गंदा पानी आ रहो है। छह दिन से आधे पेट खाना खाकर जीवन काट रहे हैं। प्रशासन की ओर से अगर कुछ दिन पके खाने का इंतजाम हो जाए। तब आटा- सब्जी अन्य सामग्री की व्यवस्था हो जाएगी। कायछी के रास्ते में वृद्ध जगमोहन सिंह एक हाथ में आलू की पन्नी और एक में जूते टांगे जा रहे थे। बोले- लला कछू पूछो नहीं आठ दिन हो गए कोऊ पूछन नहीं आओ। बाढ़ से पूरो गांव गिरो हतो। नमक से रोटी खाए के जिए। छोटे बच्चों की तो बहुत परेशानी हती।