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कैंसर के डर से नॉनवेज शौकीन खाने लगे दाल, दक्षिण एशिया के देश इसलिए अपना रहे हैं इंडियन मॉडल

Fri, 06 Sep 2019 02:35 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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दाल की हो रही तस्करी - फोटो : PTI
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जो लोग मांसाहारी भोजन के शौकीन रहे हैं, वे अब कैंसर के डर से दालों को खा रहे हैं। इससे दालों की मांग देश के अंदर दक्षिण एशिया में बढ़ रही है। दक्षिण एशियाई देश दालों के इस्तेमाल और उत्पादन के इंडियन मॉडल को अपना रहे हैं। दालों में सबसे अधिक चना पसंद किया जा रहा है।
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भारतीय दलहन संस्थान के 26वें स्थापना दिवस के मौके पर निदेशक डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि 20 सालों में दालों की सात सौ प्रजातियां विकसित हुई हैं। इसके साथ ही एशिया के अलावा अन्य देशों में भी दालों का निर्यात बढ़ रहा है। इस मौके पर विज्ञानियों को पुरस्कार वितरित किए गए।

 

स्थापना दिवस समारोह की शुरुआत मुख्य अतिथि पूर्व निदेशक डॉ. शंकरलाल और डॉ. मसूद अली ने दीप जलाकर की। इस मौके पर निदेशक डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि पिछले साल दालों की 17 नई प्रजातियां विकसित की गई हैं। संस्थान में पांच सौ करोड़ तक की बड़ी परियोजनाएं हैं।

दालों के क्षेत्र में मौलिक और रणनीतिक दोनों तरह के शोध किए जा रहे हैं। 17 प्रजातियों में मूंग की चार प्रजातियां हैं। इस मौके पर पूर्व निदेशक डॉ. शंकरलाल ने संस्थान के इतिहास के संबंध में बताया। डॉ. मसूद अली ने सेहत के मद्देनजर दालों की गुणवत्ता सुधार पर बल दिया। इस मौके पर तकनीकी पुस्तिका और विभिन्न प्रजातियों के आठ हैंड आउट का विमोचन किया गया। ेकार्यक्रम का संचालन डॉ. मीनल राठौर और डॉ. उमा शाह ने किया।

 
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इन्हें मिला सम्मान
उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार (वरिष्ठ श्रेणी)-डॉ. राजकुमार मिश्रा, उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार (युवा श्रेणी)-डॉ. रेवेनप्पा एस. बिरादर, सर्वोत्तम कार्यकर्ता (तकनीकी अधिकारी संवर्ग) अरविंद सिंह यादव, सर्वोत्तम कार्यकर्ता (प्रशासनिक संवर्ग)-मीनाक्षी वार्ष्णेय, उत्कृष्ट टीम अवार्ड-डॉ. राजेश कुमार, डॉ. सीएस प्रहराज, डॉ. देवराज, डॉ. सीपी नाथ, डॉ. श्रीपद भट्ट, चंद्रमणि त्रिपाठी, प्रदीप कुमार को दिया गया।

बुंदेलखंड को ध्यान रखकर तैयार करते बीज
-दल संस्थान के निदेशक डॉ. नरेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि बुंदेलखंड को ध्यान में रखकर प्रदेश में दालों के बीज तैयार किए जाते हैं। दलहनी फसलों में वैसे भी कम पानी की जरूरत होती है। बुंदेलखंड के सभी जिलों में सीड हब बनाया गया है। 
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