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अंग्रेजों ने कानपुर में बनवाए थे 6 क्लॉक टावर, इन घंटाघरों की टन-टन तय करता था टाइम टेबल

Sat, 09 Feb 2019 05:23 PM IST
शिखा पांडेय ऐश्वर्या द्विवेदी, अमर उजाला, कानपुर
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एक जमाना था जब घड़ी रखना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं थी एक घर क्या, पूरे मोहल्ले में एक घड़ी होना बड़ी बात होती थी। मजदूरों का शहर कहे जाने वाले कानपुर में अंग्रेजों ने मिलों और मुख्य बाजारों में श्रमिकों को यह सुविधा देने के लिए घंटाघर बनवाए थे। घनी आबादी में बने इन घंटाघरों की टिक-टिक पर श्रमिक तो चलते ही थे, बल्कि पूरे इलाके का टाइम टेबल सेट होता था। सुबह के चार बजे उठना है तो टन-टन गिनने के बाद घरवाले उठाते थे।

चावल मंडी, कलक्टरगंज, हटिया आदि इलाकों की दुकानों में काम करने वाले कर्मचारी टन-टन गिन अपनी दिनचर्या तय करते थे। घनी दोपहरी हो, काले बदलों का डेरा या सर्दी में छोटा होता दिन। घंटाघर की टन सही वक्त बतलाता था। एक बार फिर कलक्टरगंज के घंटाघर का टन-टन सुनाई देने वाला है।
हर एक घंटे में यह आवाज करेगा। नगर निगम ने काम शुरू करा दिया है, तीन महीने में काम पूरा होने की उम्मीद है। आइये आपको शहर के ऐसे ही क्लॉक टावरों के बारे में बताते हैं, जिनका इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है...

सन 1912 : मिल और मजदूर बढ़े तो बना दूसरा क्लॉक टावर
धीरे-धीरे मिल और मजदूरों की संख्या बढ़ती गई तो एक और क्लॉक टावर की आवश्यकता हुई। दूसरे क्लॉक टावर का निर्माण किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉल फूलबाग में कराया गया। इसका निर्माण सन 1911 में हुआ था। इसके निर्माण में एक अंग्रेजी अधिकारी बिलक्रिस्ट का खास योगदान रहा। इसके लिए उन्होंने अपने पास से 30 हजार रुपये का सहयोग किया था। 11 जून 1912 को जैमन कोबोल ने इस घंटाघर का शुभारंभ किया था।
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सन 1880 : दो लाख रुपये में बना था शहर का पहला क्लॉक टावर
एक जमाना था जब घड़ी रखना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं थी पर समय जानना सभी को जरूरी था। इसके चलते सबसे पहले श्रमिकों को यह सुविधा देने के लिए घड़ी की आवश्यकता हुई। इसके चलते लाल इमली ऊलेन मिल के प्रबंधक गौविन जोंस ने मिल के पूर्वी कोने पर ऊंची मीनार बनवाकर सन 1880 में घड़ी लगवाई थी। इस घड़ी की सुई इंग्लैंड से मंगवाई गई थी। शहर का यह पहला क्लॉक टावर था। इसे बनाने में करीब दो लाख रुपये का खर्च आया था। छह महीने में बनकर तैयार हुए इस टावर को देखने दूर-दूर से लोग आते थे। 
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सन 1929 : एक बार टला फिर बना तीसरा क्लॉक टावर
दूसरे क्लॉक टॉवर के करीब डेढ़ दशक बाद कोतवाली में शहर का तीसरा टावर बनाने की घोषणा हुई। यह घोषणा जनरल रॉबर्ट विंट ने की थी। हालांकि तब के इलेक्ट्रिसिटी कारपोरेशन के कुछ अफसर इसके विरोध में आ गए। इसके चलते इस क्लॉक टावर का निर्माण फिलहाल टल गया। फिर सन 1925 में कोतवाली क्लॉक टावर का निर्माण शुरू हुआ। 17 जुलाई 1929 को इस टावर का शुभारंभ हुआ। इसके बाद साल 1931 में कानपुर इलेक्ट्रिसिटी कारपोरेशन की इमारत (अब पीपीएन मार्केट बिजलीघर) में शहर का चौथा टावर बनाया गया। इस टावर के निर्माण में 80 हजार रुपये का खर्च आया था। यह 1932 में शुरू हो गया।

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सन 1934 : पांचवां क्लॉक टावर सिंहानिया समूह का कमला टावर
फीलखाना में बने शहर के पांचवें क्लॉक टावर का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है। इस टावर का निर्माण एक भारतीय ने कराया था। 1934 में जेके उद्योग समूह के मालिक लाला कमलापत सिंहानिया ने अपने समूह के मुख्यालय पर यह टावर बनवाया, जो वर्तमान में कमला टावर नाम से मशहूर है। कहा जाता है कि लाला कमलापत सिंहानिया ने इस टावर की घड़ी को मात्र एक दिन की कमाई से स्थापित कराया था। स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर में एक भारतीय द्वारा इस तरह का निर्माण कराया जाना ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह जैसा था।
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सन 1935 : कलक्टरगंज चौराहे पर बने टावर में दिखती कुतुब मीनार की झलक
शहर का छठवां क्लॉक टावर स्टेशन के पास कलक्टरगंज चौराहे पर बना। इस टावर की वजह से ही इसे घंटाघर चौराहे के नाम से जाना जाने लगा। इसका निर्माण सन 1932 में हुआ था। डिजाइन की वजह से ही इसकी तुलना दिल्ली की कुतुब मीनार से की जाती है। इसके पहले बने सभी टावर किसी न किसी भवन का हिस्सा हैं। यह इकलौता ऐसा क्लॉक टावर है जो स्वतंत्र रूप से बना है। इसके निर्माण में अंग्रेज जार्ज टी बुम का योगदान रहा। इसके निर्माण में पांच लाख रुपये का खर्च आया था और तीन साल बाद यह शुरू हुआ था। 
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सन 1946 : स्वरूप नगर में बिना सुई वाला घंटाघर 
कानपुर का सबसे आखिरी और सातवां क्लॉक टावर स्वरूप नगर बाजार में सन 1946 मेें बनाया गया। इस टावर में घड़ी तो बन गई लेकिन सुई आज तक नहीं लगाई जा सकी। दरअसल उन दिनों आजादी की लड़ाई जोर पकड़े थी। इस कारण कई बार इसका निर्माण बीच-बीच में रुका। माना जाता है कि इसी कारण इस पर सुई नहीं लगाई जा सकी। इसका निर्माण लार्ड विलियम ने कराया था।
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