जंगल में मूर्ति मिलने के कारण माता का नाम जंगली देवी पड़ गया। यहां पर मंदिर निर्माण के समय अखंड ज्योति जलाई गई थी जो आज भी प्रज्ज्वलित है। मान्यता है कि दर्शन मात्र से ही मां भक्तों का कल्याण करती हैं।
बात 1970 से भी पहले की है। तब किदवई नगर में दूर-दूर तक जंगल हुआ करता था। यहां पर एक विशालकाय नीम का पेड़ था। जब यह पेड़ खोखला हुआ तो उसमें से मां दुर्गा की प्रतिमा निकली। इसके बाद आसपास के लोगों ने उनकी पूजा करनी शुरू कर दी। 1979 में तेज आंधी पानी से पेड़ गिर गया था।
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दूसरे दिन सुबह लोगों ने मां को खुले आसमान के नीचे देखा तो चंदा एकत्र कर मठिया का निर्माण कराया। मंदिर के प्रबंधक विजय पांडेय ने बताया कि जंगल में मूर्ति मिलने के कारण माता का नाम जंगली देवी पड़ गया। तभी श्री जंगली देवी मंदिर ट्रस्ट बना। ट्रस्ट के सदस्य आज भी मंदिर की देखरेख करते है।
यहां पर मंदिर निर्माण के समय अखंड ज्योति जलाई गई थी जो आज भी प्रज्ज्वलित है। मान्यता है कि दर्शन मात्र से ही मां भक्तों का कल्याण करती हैं। नवरात्र पर मंदिर में शहर के अलावा दूर-दूर के जिलों से सैकड़ों लोग दर्शन करने के लिए यहां आते हैं। मां ढाई क्विंटल भारी सिंहासन पर विराजमान हैं, प्रतिमा के ऊपर लगा छत्र भी चांदी का है।