इसे प्रदूषण का कारक भी माना जाता रहा है। साथ ही इसका निस्तारण कराने में चीनी मिलों का खर्च बढ़ जाता है, लेकिन इससे निकलने वाला नैनो सिलिका पार्टिकल्स प्रदूषण सोखने के भी काम आता है। एनएसआई के निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने बताया कि नैनो सिलिका पार्टिकल्स की खोज और इसकी तकनीक सीनियर रिसर्च फैलो डॉ. शालिनी कुमारी ने की है। उनके गाइड डॉ. विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव थे। इस तकनीक को विकसित करने में दो साल लगे हैं। उन्होंने बताया कि अभी तक विभिन्न मिनरल्स स्रोतों से नैनो सिलिका मिलता है। बायो स्रोत से पहली बार खोजा गया है।
निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने बताया कि तकनीक को पेटेंट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। गोवा में 28-29 जुलाई को भारतीय चीनी प्रोद्योगिकी संघ के सम्मेलन में भी इस तकनीक को प्रस्तुत किया जाएगा। सीनियर रिसर्च फैलो शालिनी कुमारी ने इस प्रक्रिया में अम्ल, क्षार और हीट ट्रीटमेंट के चरणों के संबंध में बताया। नैनो सिलिका तकनीक की जांच आईआईटी दिल्ली से भी कराई गई। उत्पाद की पुष्टि स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी, एक्सरे विवर्तन विश्लेषण और फूरियर ट्रांसफॉर्म इंफ्रा रेड तकनीक से की गई।