ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद रेलवे ट्रैक पर यातायात सुगम बनाने के लिए जर्मनी से लाई गई 140 टन ब्रेक डाउन क्रेन की हकीकत मुरी डिरेलमेंट में उजागर हुई। मुरी के दस कोचों को उठाने में इस क्रेन ने 20 घंटे से अधिक समय लिया। दावा किया गया था यह क्रेन चंद घंटों में अपना काम कर देगी। बावजूद इसके दिल्ली-हावड़ा रूट दुर्घटना के 37 घंटे बाद सामान्य हो सका। इससे रेलवे की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न लगता दिखाई पड़ रहा है।
मुरी एक्सप्रेस 25 मई को सिराथू और अथसराय रेलवे स्टेशन के बीच बेपटरी हो गई थी। ट्रेन के दस कोच पटरी से उतर गए थे और तीन यात्रियों की मौत हो गई थी। दुर्घटना के बाद तत्काल कानपुर सेंट्रल से रेलवे रिलीफ ट्रेन को रवाना किया गया था। इस ट्रेन के साथ ही 140 टन ब्रेक डाउन क्रेन को भी भेजा गया। दुर्घटनाग्रस्त इलाके में मुरी की बोगियो को उठाने में क्रेन की पोल खुल गई। क्रेन ने एक-एक कोच को उठाने में चार-चार घंटे का समय लिया। इसके चलते दिल्ली-हावड़ा रूट देर से चालू हो सका।
वहीं दूसरी ओर सितंबर-अक्तूबर में जूही खलवा पुल के गर्डर बदलने को हरियाणा से 340 टन की क्रेन मंगाई गई थी, जिसने दो दिन में पुल के चार गर्डर आसानी से बदल दिए। इस ट्रेन का प्रतिदिन का किराया 10 लाख रुपये था। इसे देखकर लगता है कि रेलवे से अच्छी क्रेन प्राइवेट लोगों के पास है। वह भी तब जब रेलवे का देश भर में सबसे बड़ा नेटवर्क है।
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जिम्मेदार बोले
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140 टन ब्रेक डाउन क्रेन ने मुरी एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त डिब्बों को उठाने का काम किया था, पर यह काम करने में क्रेन ने काफी समय लगाया। माना जा रहा था कि क्रेन चंद घंटों में अपना काम समाप्त कर रेलमार्ग सामान्य कर देगी, पर रेलमार्ग सामान्य होने में 37 घंटे लग गए थे।
-विजय कुमार, सीपीआरओ, उत्तर मध्य रेलवे
दावा
क्रेन का नाम है-140 टन ब्रेक डाउन। इसे जर्मनी से लाया गया था। इसकी कीमत 44 करोड़ रुपये है। मेंटिनेंस के लिए इसे जमालपुर (बिहार) भेजा जाता है। एक बोगी का वजन 47 टन होता है, जिसे यह आसानी से उठा लेती है। इसके चलते इसे वन आफ बेस्ट क्रेन इन इंडिया भी कहा जाता है।