ऐसे में कई रिसर्च के बाद उनको मशरूम के कई फायदों के बारे में पता चला। तब उन्होंने थर्माकोल को पर्यावरण के अनुकूल बनाने पर विचार किया। चैतन्य कहते हैं कि आइडिया था लेकिन इसे आगे बढ़ाना नहीं पता था। ऐसे में 2021 में अपनी कंपनी किनोको बॉयोटेक बनाकर आईआईटी कानपुर के इंक्यूबेशन सेंटर से इंक्यूबेट कराया। आईआईटी की मदद से ही थर्माकोल बनाने में सफलता मिली।
कृषि अपशिष्ट और मशरूम दोनों ही जरूरी
चैतन्य कहते हैं कि कृषि अपशिष्ट की मदद से थर्माकोल तैयार होता है। थर्माकोल को बांधने का काम मशरूम की जड़ों से निकलने वाले प्राकृतिक चिपचिपा पदार्थ से किया जाता है। कृषि अपशिष्ट और प्राकृतिक रेशों के संयोजन का उपयोग करते हैं, इससे थर्माकोल लंबे समय तक चलता है। मजबूती के मामले में इसकी तुलना उच्च-घनत्व वाले थर्माकोल से की जाती है।
बॉयोडिग्रेडेबल थर्माकोल 90 दिनों में हो जाता है विघटित
चैतन्य कहते हैं कि यह बॉयोडिग्रेडेबल थर्माकोल उर्वरक के रूप में भी काम करता है। यह 60 से 90 दिनों में विघटित हो जाता है। एक बार जब इसका उद्देश्य पूरा हो जाए, तो बस इसे तोड़ कर गमलों में डाल दें तो यह प्राकृतिक उर्वरक के रूप में कार्य करेगा। पॉलीस्टाइरीन से बनने वाले थर्माकोल और मशरूम, पराली से बनने वाले थर्माकोल के रेट में अधिक अंतर नहीं है। हालांकि पराली से बनने वाला थर्माकोल 10 से 15 फीसदी भारी होता है।