'कानपुर देहात से गुजरने वाले एनएच-2 की दाईं तरफ लगभग पौने दो किमी दूर हमें सरवनखेड़ा ब्लॉक का चिराना गांव नजर आया। यहां के प्राइमरी स्कूल में कुछ बच्चों को गर्म कपड़े बांटे जा रहे थे। एक कमरे पर आंगनबाड़ी केंद्र लिखा था। जब प्रधानाध्यापक चंद्रकांती से पूछा तो बोलीं, यह बंद रहता है।
यहीं घूरे पर कई बच्चे खेल रहे थे, पूछा तो बोले- आंगनबाड़ी केंद्र बंद हैं, खेल रहे हैं। इनमें एक कक्षा दो का सिटू और आदर्श था। तब तक वहां एक किशोरी आ गई। नाश्ते में क्या खाया? जवाब में किशोरी बोली कि पेट में कीड़े हैं। खाना नहीं खाते।
हम फिर उस शिक्षिका के पास लौटे और मेडिकल टीम के संबंध में पूछा, तो बोलीं- कि साल-डेढ़ साल पहले आए थे। पेट के कीड़े और आयरन की गोलियां दे गए थे, फिर नहीं आए। दो हजार की आबादी वाले इस चिराना गांव में हम डेढ़ घंटे तक घूमते रहे।
यहां कक्षा दो की रुचि और रोशनी से पूछा कि क्या खाती हैं? बोलीं, दाल और चावल। साथ में उनकी मां भी थीं, पूछा तो बोलीं कि बच्चों को आयरन, फॉलिक एसिड कभी नहीं दी। खुद उन्होंने भी कभी नहीं खाई।
आंगनबाड़ी केंद्रों पर मेडिकल टीम ने इन्हें कभी आयरन की टैबलेट नहीं दी। एक-दो गर्भवती महिलाएं मिलीं जिनका कहना था कि सुबह चाय और रोटी का ही नाश्ता करते हैं। इससे लगा कि बच्चों में कुपोषण की बुनियाद मां की कोख से ही पड़ रही है।
35 प्रतिशत महिलाएं एनिमिक
इसके बाद हम सीधे जिला अस्पताल के एनआरसी वार्ड पहुंचे। वहां हमें अमरौधा ब्लॉक के मूसानगर की चार महीने की आरोही कुपोषित मिली। उसकी मां अभिलाषा को सीवियर एनीमिया था। आरोही कुपोषित ही पैदा हुई। बाद में पोषण पुनर्वास केंद्र में रखकर उसका इलाज किया गया।