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कुपोषण से जूझ रहा कानपुर देहात, महिलाओं में खून की कमी, पोषण आहार नहीं मिलने से बच्चे बीमार

रजा शास्त्री, कानपुर Published by: प्राची प्रियम Updated Thu, 14 Jan 2021 03:16 PM IST

सार

इन दिनों दुनिया भर में कोरोना का दहशत फैला हुआ है। कोरोना संक्रमण तो वो बीमारी है जो दुनिया की नजरों के सामने है और इससे बचाव के लिए लोगों ने अपनी जीवनशैली तक बदल डाली है। लेकिन इससे बड़ी एक और बीमारी है जो वर्षों से हमारे बीच पनप रही है और हमारे अपनों को लील रही है। हम बात कर रहे हैं कुपोषण की समस्या के बारे में। जागरूकता की कमी, संकिर्ण मानसिकता और लोगों की लापरवाही के कारण कई ऐसे मामले सामने आते हैं जहां पीढ़ियों से कुपोषण की बीमारी चलती आ रही है। आज हम आपको अमर उजाला के रजा शास्त्री की रिपोर्ट के माध्यम से बता रहे हैं उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में कुपोषण की हालत-
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कानपुर देहात में कुपोषण की मार झेलते बच्चे - फोटो : अमर उजाला
'कानपुर देहात से गुजरने वाले एनएच-2 की दाईं तरफ लगभग पौने दो किमी दूर हमें सरवनखेड़ा ब्लॉक का चिराना गांव नजर आया। यहां के प्राइमरी स्कूल में कुछ बच्चों को गर्म कपड़े बांटे जा रहे थे। एक कमरे पर आंगनबाड़ी केंद्र लिखा था। जब प्रधानाध्यापक चंद्रकांती से पूछा तो बोलीं, यह बंद रहता है। 

यहीं घूरे पर कई बच्चे खेल रहे थे, पूछा तो बोले- आंगनबाड़ी केंद्र बंद हैं, खेल रहे हैं। इनमें एक कक्षा दो का सिटू और आदर्श था। तब तक वहां एक किशोरी आ गई। नाश्ते में क्या खाया? जवाब में किशोरी बोली कि पेट में कीड़े हैं। खाना नहीं खाते। 


हम फिर उस शिक्षिका के पास लौटे और मेडिकल टीम के संबंध में पूछा, तो बोलीं- कि साल-डेढ़ साल पहले आए थे। पेट के कीड़े और आयरन की गोलियां दे गए थे, फिर नहीं आए। दो हजार की आबादी वाले इस चिराना गांव में हम डेढ़ घंटे तक घूमते रहे।

यहां कक्षा दो की रुचि और रोशनी से पूछा कि क्या खाती हैं? बोलीं, दाल और चावल। साथ में उनकी मां भी थीं, पूछा तो बोलीं कि बच्चों को आयरन, फॉलिक एसिड कभी नहीं दी। खुद उन्होंने भी कभी नहीं खाई। 

आंगनबाड़ी केंद्रों पर मेडिकल टीम ने इन्हें कभी आयरन की टैबलेट नहीं दी। एक-दो गर्भवती महिलाएं मिलीं जिनका कहना था कि सुबह चाय और रोटी का ही नाश्ता करते हैं। इससे लगा कि बच्चों में कुपोषण की बुनियाद मां की कोख से ही पड़ रही है।

35 प्रतिशत महिलाएं एनिमिक
इसके बाद हम सीधे जिला अस्पताल के एनआरसी वार्ड पहुंचे। वहां हमें अमरौधा ब्लॉक के मूसानगर की चार महीने की आरोही कुपोषित मिली। उसकी मां अभिलाषा को सीवियर एनीमिया था। आरोही कुपोषित ही पैदा हुई। बाद में पोषण पुनर्वास केंद्र में रखकर उसका इलाज किया गया। 
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कानपुर देहात में कुपोषण की मार झेलते बच्चे - फोटो : अमर उजाला
'कानपुर देहात से गुजरने वाले एनएच-2 की दाईं तरफ लगभग पौने दो किमी दूर हमें सरवनखेड़ा ब्लॉक का चिराना गांव नजर आया। यहां के प्राइमरी स्कूल में कुछ बच्चों को गर्म कपड़े बांटे जा रहे थे। एक कमरे पर आंगनबाड़ी केंद्र लिखा था। जब प्रधानाध्यापक चंद्रकांती से पूछा तो बोलीं, यह बंद रहता है। 

यहीं घूरे पर कई बच्चे खेल रहे थे, पूछा तो बोले- आंगनबाड़ी केंद्र बंद हैं, खेल रहे हैं। इनमें एक कक्षा दो का सिटू और आदर्श था। तब तक वहां एक किशोरी आ गई। नाश्ते में क्या खाया? जवाब में किशोरी बोली कि पेट में कीड़े हैं। खाना नहीं खाते। 

हम फिर उस शिक्षिका के पास लौटे और मेडिकल टीम के संबंध में पूछा, तो बोलीं- कि साल-डेढ़ साल पहले आए थे। पेट के कीड़े और आयरन की गोलियां दे गए थे, फिर नहीं आए। दो हजार की आबादी वाले इस चिराना गांव में हम डेढ़ घंटे तक घूमते रहे।

यहां कक्षा दो की रुचि और रोशनी से पूछा कि क्या खाती हैं? बोलीं, दाल और चावल। साथ में उनकी मां भी थीं, पूछा तो बोलीं कि बच्चों को आयरन, फॉलिक एसिड कभी नहीं दी। खुद उन्होंने भी कभी नहीं खाई। 

आंगनबाड़ी केंद्रों पर मेडिकल टीम ने इन्हें कभी आयरन की टैबलेट नहीं दी। एक-दो गर्भवती महिलाएं मिलीं जिनका कहना था कि सुबह चाय और रोटी का ही नाश्ता करते हैं। इससे लगा कि बच्चों में कुपोषण की बुनियाद मां की कोख से ही पड़ रही है।

35 प्रतिशत महिलाएं एनिमिक
इसके बाद हम सीधे जिला अस्पताल के एनआरसी वार्ड पहुंचे। वहां हमें अमरौधा ब्लॉक के मूसानगर की चार महीने की आरोही कुपोषित मिली। उसकी मां अभिलाषा को सीवियर एनीमिया था। आरोही कुपोषित ही पैदा हुई। बाद में पोषण पुनर्वास केंद्र में रखकर उसका इलाज किया गया। 
 

डेरापुर ब्लॉक के कैरामऊ के अखिलेश कुमार की एक साल की बेटी दिव्यांशी को खाना ही नहीं खिलाया जा रहा था। बाहर से उसे फीडिंग नहीं दी गई और वह कुपोषण की गिरफ्त में आ गई। पुनर्वास केंद्र में इस महीने चार बच्चे आए, उनमें तीन बेटियां थीं। 

जिला महिला अस्पताल में यहां की सीएमएस डॉ. सुमन मिश्रा मिल गईं। उनसे पूछा तो बताया कि 30-35 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक आती हैं। इनमें 20 फीसदी को सीवियर एनीमिया होता है। उनका खानपान और फिर इंजेक्शन से ठीक करने की कोशिश की जाती है। 

क्या बताएं? यहां से आयरन की गोलियां ले जाती हैं, फिर बाहर जाकर फेंक देती हैं। अफसरों के दावे के विपरीत अकबरपुर ब्लॉक के भुगनियापुर की भी स्थिति कुछ ऐसी ही मिली। बताया गया कि यह पढ़े-लिखे लोगों का गांव है। यहां के बच्चों के चेहरों पर भी कुपोषण की लकीर नजर आई। 

डाइट चार्ट पूछा तो कक्षा में छह में पढ़ रहा नयन बोला कि सुबह नाश्ते में चाऊमीन खाते हैं। तभी कक्षा छह का अनमोल, कक्षा छह में पढ़ रहा शंभू समेत कई लड़के बोल उठे मैगी भी खा लेते  हैं। पोषाहार के संबंध में पूछा कि तो बोले- जब से कोरोना लॉकडाउन लगा है, कुछ नहीं मिल पा रहा है। 

कानपुर देहात के जिला कार्यक्रम अधिकारी राकेश यादव बताते हैं कि बच्चे पालक नहीं, कुरकुरे खाते हैं...क्या समझाएं। आंगनबाड़ी प्रभारियों और आशा से कहा गया है कि 15 दिन में भ्रमण कर लोगों के कुपोषण को दूर करने के लिए काउंसलिंग करें। लोग पांच रुपये की पालक नहीं खाते कुरकुरे खा लेते हैं, क्या समझाया जाए? ड्राई राशन दिया जा रहा है। दूध, घी भी दिए जाने की योजना है।

26702 बच्चे कुपोषित
कानपुर देहात के सभी 10 ब्लॉकों में कुपोषित बच्चे हैं। 26702 कुल कुपोषितों में 3150 बच्च अति कुपोषित हैं। बच्चों का कुपोषण दूर करने के लिए घर वालों की काउंसलिंग की जा रही है। 

जिला अस्पतालों के डाक्टरों का कहना है कि बच्चों और बड़ों सभी के पेट में कीड़े हैं। इससे भी एनीमिया और कुपोषण होता है। सबको छह महीने में एक बार कीड़े की दवा खाने की सलाह दी जाती है।

बच्ची खोई तब सचेत हुईं

अकबरपुर की शकुंतला देवी के इस वक्त चार बच्चे हैं। 15 साल पहले उनकी बच्ची की मौत हो गई थी। डेढ़ साल की होने पर उसे सांस का संक्रमण हो गया। जिला अस्पताल में दिखाने के बाद उसे कानपुर के हैलट अस्पताल ले गईं, लेकिन वह बच न सकी। 

डॉक्टर कहने लगे कि कुपोषण के कारण बच्ची संक्रमण से नहीं बच पाई। इसके बाद अन्य बच्चों को डॉक्टर की सलाह के मुताबिक हरी सब्जियां, दाल, रात को दूध और गुड़ बराबर देती हैं। सभी स्वस्थ हैं।'
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