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महामुनि विद्यासागर ब्रह्मलीन: सुधा सागर बोले- कानपुर वालों से कहता था, आचार्य श्री के पास जाओ, अब कहां भेजूंगा

Mon, 19 Feb 2024 02:10 PM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

ब्रह्मलीन महामुनि विद्यासागर को शिष्य मुनि आचार्य सुधा सागर ने कानपुर के बृजेंद्र स्वरूप पार्क में विनयांजलि दी।
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आचार्य सुधा सागर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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गुरुदेव विद्यासागर द्वारा समाज में दिए गए उनके योगदान की वजह से आज जैन समाज को सिर उठाकर जीने का अधिकार मिला है। शिष्य मुनि आचार्य सुधा सागर ने कहा कि मुझ मूर्ख को भी लोगों की जिज्ञासाओं को शांत करने लायक बना दिया। जब कोई बात आती थी, तो कानपुर वालों से मैं कहता था कि आचार्य श्री के पास जाओ, लेकिन अब मैं आप सबको कहां भेजूंगा। आचार्य श्री विद्यासागर जी के आदेश पर ही आगरा से कानपुर आ गया, लेकिन अब मुझे आगे का आदेश कौन देगा।

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गोशाला संवर्धन, हथकरघा केंद्र, अहिंसा की प्रेरणा, गुरुकुल पद्धति से बालिका शिक्षा के जरिये कम समय में ही आचार्य विद्यासागर जन-जन के संत बन गए थे। सुबह जब 2:50 बजे मुझे जगाकर बताया गया कि गुरुदेव ने समाधि ले ली है, तो उस समय भी स्वप्न में आचार्यश्री कुंडलपुर में मेरे द्वारा नमोस्तु कहे जाने पर मुझे आशीष देते दिख रहे थे। उनके जाने से एक युग की समाप्ति हो गई। आचार्य जी अनियत विहारी थे, बिना सूचना के चल देते थे। पहले से किसी को पता नहीं चलने देते थे कि कहां के लिए निकलेंगे।

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आचार्यश्री विद्यासागर के जीवन से मिलती हैं ये पांच बड़ी सीखें
समय का सदुपयोग :
विद्यासागरजी जीवन का एक क्षण भी बर्बाद नहीं करते थे। उन्होंने समाज को नियम और संयम से चलने की प्रेरणा दी और उसे खुद पर लागू किया।
स्वस्थ जीवन : अपने जीवन काल के दौरान आचार्य विद्यासागर ने चीनी, नमक, जूस को त्याग कर वस्तुओं के प्रति मनुष्य की आसक्ति पर जीत एवं संतुलित आहार के जरिये स्वस्थ जीवन जीने की कला सिखाई।
आत्मसंयम का संदेश : जो व्यक्ति दूसरों के अवगुण देखता है और दूसरों को सुखी देखकर ईर्ष्या करता है, वह कभी सुखी नहीं रह सकता। इस सिद्धांत पर चलने वाले विद्यासागर जी ने लोगों को आत्मसंयम का संदेश दिया।
बालिका शिक्षा : आचार्य श्री विद्यासागर ने देशभर में बालिका शिक्षा के लिए गुरुकुल पद्धति से स्कूलों की स्थापना की। इससे बेटियों को शिक्षा हासिल करने में आसानी हुई।
स्वदेशी उत्पाद अपनाने का संदेश : हथकरघा केंद्रों की स्थापना के जरिये रोजगार से लोगों को जोड़ा। इससे जैन समाज समेत अन्य समाज को आत्मनिर्भर बनने का संदेश मिला। देश में निर्मित उत्पादों को अपनाने का संदेश दिया।
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