रानी लक्ष्मीबाई ने मंदिर का निर्माण पूरा कराया था, लेकिन मूर्ति आज भी स्थापित नहीं है। यह मंदिर लगभग डेढ़ सौ से दो सौ वर्ष पुराना बताया जाता है।
नवरात्र में लगता है भक्तों का जमावड़ा
देवी मां के इस विख्यात मंदिर पर हर वर्ष नवरात्रि के समय दूर-दराज से लाखों की संख्या में श्रद्धालु पूजा अर्चना करने आते हैं। मां कालिका के दरबार में पूजा अर्चना करने वाले देवी भक्त देवी के साथ-साथ उसी मंदिर परिसर में देवी के बगल में ही स्थित सैय्यद बाबा की मजार पर भी पूजा अर्चना करते हैं। यह मंदिर सांप्रदायिक सौहार्द की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत करता है, जहां लोग हिंदू धर्म के लोग देवी मां की पूजा अर्चना करने आते हैं। वहीं सैय्यद बाबा की मजार पर कौड़ियां, चादर और प्रसाद भी चढ़ाते हैं। मजार की देखभाल करने वाले अरमान अली कहते हैं कि वो कई पीढ़ियों से मजार पर पूजा कराते आ रहे हैं।
यह मंदिर नौ सिद्धपीठों की तरह ही पूजनीय है। मंदिर धर्म, आस्था, एकता, सौहार्द, मानवता व प्रेम की पाठशाला है। चैत्र और शारदेय नवरात्रि में यहां बड़ा मेला लगता है। मेले में देश के दूरदराज से आए श्रद्धालु अपनी मनौती मांगते हैं और कार्य पूर्ण होने पर ध्वजा, नारियल, प्रसाद व भोज का आयोजन श्रद्धाभाव से करते हैं।
कस्बा लखना स्थित मां कालिका देवी का मंदिर एक सांप्रदायिक सौहार्द की सबसे बड़ी मिसाल है। वहीं, देवी मां के मंदिर पर दशकों से दलित पुजारी ही पूजा अर्चना कराते आ रहे हैं। यह अपने आप में भी एक अनूठी मिसाल है। दलित पुजारी कपिल कुमार कहते हैं की उनकी कई पीढियां मंदिर में पूजा कराती आ रही हैं।