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बीएलओ ने कुएं में भांग डाली, सब अमृत समझ पी गए

Tue, 21 Feb 2017 12:23 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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उत्तर प्रदेश चुनाव 2017
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कम वोटिंग से कानपुर की नाक कटवाने में सरकारी मशीनरी सबसे ज्यादा जिम्मेदार है लेकिन पब्लिक की उदासीनता भी कम नहीं है। वोटर लिस्ट बनवाने में सर्वाधिक अहम भूमिका निभाने वाले बीएलओ (बूथ लेवल ऑफीसर) ने अफसरों को धोखा दिया।
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घर-घर जाकर सत्यापन नहीं किया, अपने सूत्रों के बताने पर वोटर घटा-बढ़ा दिए या उनके पोलिंग केंद्र बदल दिए। अफसरों की लापरवाही ये कि उन्होंने थोड़ा बहुत जानते हुए भी बीएलओ की करतूतों की जांच नहीं करवाई, उनकी रिपोर्ट को क्रास चेक तक नहीं किया। इसका रिजल्ट यह हुआ कि बीएलओ की बनाई वोटर लिस्ट हर संबंधित अफसर की टेबिल से ओके होती चली गई।

पब्लिक की कमी यह कि बार-बार कहने के बावजूद किसी ने यह देखने की जहमत नहीं उठाई कि उसका नाम वोटर लिस्ट में है या नहीं। कई बार चले पुनरीक्षण अभियान में किसी ने यह तक नहीं देखा कि उनका बूथ कौन सा है। अमर उजाला ने इस बाबत पड़ताल की तो हर कदम पर गलती नजर आई।
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ये रहीं गलतियां

उत्तर प्रदेश चुनाव 2017
- बीएलओ नहीं पहुंचे घर-घर : निर्वाचन कार्य के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के कर्मचारियों को बूथ लेवल आफीसर बनाया जाता है। नए वोटर बनने के लिए आवेदन करने वालों का सत्यापन, मृत लोगों के नाम सूची से हटवाने, दूसरी जगह शिफ्ट हुए लोगों के नाम हटवाने, शादी होने पर बेटी का नाम हटवाने के लिए घर-घर सर्वे, आईडी बनने के बाद वोटर घर देने जाने और चुनाव में वोटर पर्ची घर-घर पहुंचाने की जिम्मेदारी भी होती है। नगर जिले में 3344 बीएलओ हैं। नियमानुसार इन्हें जिले के सभी 33 लाख 70 हजार 113 वोटरों का सत्यापन करना था, सबको वोटर पर्ची देनी थी लेकिन बीएलओ सर्वे के लिए घर-घर जाने के बजाय इलाके में कहीं एक जगह बैठ कर परिचित लोगों के बताने के आधार पर अपनी रिपोर्ट लगा देते हैं। इसीलिए हजारों लोगों के नाम कट गए, कई मृतकों के नाम वोटर लिस्ट में अभी भी हैं और कई बेटियों की शादी के बाद भी उनके नाम वहीं की वोटर लिस्ट में हैं। 

ईआरओ ने आंख बंद किया विश्वास
वोटर लिस्ट ठीक कराने का जिम्मा विधानसभा क्षेत्रवार ईआरओ (इलेक्ट्रोरल रजिस्ट्रेशन आफीसर) पर होता है। ईआरओ संबंधित क्षेत्र का एसीएम या एसडीएम होता है। वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने, काटने, पता बदलने, किसी तरह की गलती ठीक करने का काम ईआरओ के जिम्मे होता है। ईआरओ को केस स्टडी केआधार पर बीएलओ की रिपोर्ट को क्रास चेक भी करना होता है। इसके बाद उसे एप्रूव करता है। ईआरओ आवेदनों के आधार पर नाम घटाने, बढ़ाने, गलती ठीक कराने की सूची तीन प्रतियों में बनाता है। एक प्रति वेंडर को ऑन लाइन फीड कराने को देता है। एक प्रति निर्वाचन दफ्तर को देता है और एक खुद रखता है। कई लोगों के नाम वोटर लिस्ट में न होने से स्पष्ट है कि ईआरओ ने बीएलओ की रिपोर्ट और ऑन लाइन फीडिंग की प्रक्रिया पर आंख बंद कर विश्वास किया। जो रिपोर्ट बीएलओ ने दी, उसे जैसा का तैसा पास कर दिया।

वोटर परिसीमन में भी मनमानी
वोटर लिस्ट की गड़बड़ी के अलावा वोटर परिसीमन में भी चूक हो गई। वोटिंग के लिए वोटर का विभाजन किया जाता है। इसे परिसीमन कहते हैं। अब जरा गौर करें। मान लीजिए एक बीएलओ के हिस्से में 1500 वोटर आए। इन वोटरों का बंटवारा दो पोलिंग स्टेशन में 750-750 वोटरों में कर दिया। होता यह है कि बीएलओ 1 नंबर से लेकर 750 नंबर तक के वोटरों को एक केंद्र और 750 से लेकर 1500 तक के वोटरों को एकमुश्त दूसरे केंद्र में बांट देता है। जबकि नियमानुसार देख-देख कर एक परिवार के लोगों को एक साथ रखना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ। किसी परिवार के दो सदस्यों का वोट एक केंद्र में रहा तो बाकी का दूसरे केंद्र में। इस वजह से भी पूरा परिवार वोट डालने से कन्नी काट गया। वोटर जहां पहले वोट डालता रहा है वहीं पहुंचा। वहां की वोटर लिस्ट में उसका नाम ही नहीं मिला क्योंकि उसका पोलिंग स्टेशन बदल दिया गया था और इसकी जानकारी उसे नहीं दी गई। उप जिला निर्वाचन भी यह चूक नहीं पकड़ सके।

महागलती
जिला प्रशासन ने मतदान प्रतिशत बढ़ाने के पुरजोर प्रयास किए लेकिन मतदाता बनाने की पहली कड़ी ही टूटी है, इस ओर ध्यान नहीं दिया। पहली कड़ी यानी बीएलओ की करतूतें कायदे से जांच ली जातीं और वोटर लिस्ट में सबका सही तरीके से नाम होता तो मतदान प्रतिशत जरूर बढ़ता।
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