कानपुर। चिड़ियाघर में डेढ़ वर्ष पहले बिजनौर के जंगल से रेस्क्यू करके लाए गए तेंदुआ की रविवार को मौत हो गई। हालांकि चिड़ियाघर प्रशासन ने दो दिन तक तेंदुए की मौत की भनक किसी को नहीं लगने दी। वहीं, तेंदुए की मौत के पीछे जिम्मेदारों की लापरवाही और सबसे छोटे बाड़े में शिफ्ट करना बताया जा रहा है।
वर्ष 2023 में बिजनौर से पांच माह के तेंदुए के एक बच्चे को रेस्क्यू करके कानपुर चिड़ियाघर लाया गया था। ग्रामीणों के हमले से तेंदुए की पीठ की हड्डी में चोट आ गई थी। कानपुर चिड़ियाघर के डॉक्टरों की टीम ने करीब दो माह तक इलाज किया जिसके बाद उसका घाव पूरी तरह से सही हो गया था। उसे अस्पताल परिसर के पास एक छोटे बाड़े में शिफ्ट कर दिया गया जिसमें वह न तो सही से टहल पा रहा था और न ही उसे सही से धूप मिल पा रही थी। बाड़े में शिफ्ट होने के बाद चिड़ियाघर प्रशासन ने उसके स्वास्थ्य के प्रति चिंता नहीं की। बीच-बीच में कई बार उसने खाना नहीं खाया लेकिन जिम्मेदारों ने ध्यान नहीं दिया। करीब एक माह से पूरी तरह से खाना बंद कर दिया था तब डॉक्टरों ने उसे अस्पताल परिसर में शिफ्ट कर इलाज शुरू किया। इसके बाद भी रविवार को उसकी माैत हो गई।
निदेशक कन्हैया पटेल ने बताया कि तेंदुए की रीढ़ की हड्डियां आपस में जुड़ गईं थी जिस कारण पीठ पर गांठ पड़ गई थी। इससे उसका चलना फिरना मुश्किल हो गया था। शरीर के बाल भी झड़ने लगे थे। एक माह से उसका इलाज चल रहा था लेकिन उसकी जान नहीं बच सकी।
सीतापुर से रेस्क्यू करके लाया गया बाघ
फोटो - बाड़े में बंद बाघ
सीतापुर जिले के नरनी गांव से ट्रैंकुलाइज कर पकड़ा गया बाघ सोमवार रात को कानपुर प्राणि उद्यान लाया गया। 22 अगस्त से इस बाघ ने गांव में दहशत फैला रखी थी। सीतापुर वन विभाग की टीम और दुधवा के विशेषज्ञ करीब 45 दिन चले रेस्क्यू के बाद उसे पकड़ पाए। बाघ को अभी अस्पताल परिसर के बाड़े में रखा गया है। यह लोगों को देखते ही झपट्टा मार रहा है। हालांकि इस बाघ ने किसी को हानि नहीं पहुंचाई है। यह नरनी में स्थापित कमांड सेंटर के आसपास चहलकदमी कर रहा था।