मोहिनी चाय कंपनी के मालिक
उस समय पैकेट बंद चाय के कारोबार में बड़ी कंपनियों का दबदबा था। इनसे प्रतिस्पर्धा के लिए अग्रवाल बंधुओं के पास संसाधन तो सीमित थे, लेकिन जुनून गजब का था। महज एक लाख रुपये की जमा पूंजी और उधारी के माल से मोहनी चाय के रूप में पैकेट बंद चाय बाजार में उतारी। दिनेश बताते हैं कि काम की शुरुआत में लोग नए ब्रांड को लेने से मना कर देते थे। कई लोग सैंपल के रूप में माल रख जाने और बिकने पर पैसा देने की बात करते थे। हालत यह हो जाती कि चार-चार महीने बाद भी 40-50 किलो माल नहीं बिकता था। एक बार तो सभी भाइयों ने पिता के साथ बैठकर फैसले पर फिर से विचार किया। इस दौरान तक मशीन भी लग गई थी, बाजार में माल जाने से उधारी भी हो गई थी। इसलिए सभी ने फैसला किया कि अब पीछे नहीं हटना है।
तीन-चार साल की कड़ी मेहनत के बाद शहर के आसपास के क्षेत्रों में मोहनी चाय की मांग बढ़ी। फिर एक के बाद एक नए प्लांट लगने लगे। पनकी में उत्पादन इकाई लगाई। 2015 में दादा नगर में फैक्ट्री स्थापित हुई। इस साल रनियां में चाय उद्योग के सबसे आधुनिक जर्मन तकनीक वाले भंडारगृह (वेयरहाउस) की स्थापना की गई है। इसमें छह हजार टन चाय का भंडारण किया जा सकता है। एक लाख रुपये से शुरू हुआ कारोबार आज 350 करोड़ के टर्नओवर तक पहुंच गया है। वर्तमान में मोहनी चाय की सप्लाई उप्र, उत्तराखंड, उड़ीसा, झारखंड, बिहार, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में हो रही है। अग्रवाल बंधु संयुक्त परिवार को सफलता की बड़ी पूंजी मानते हैं। चार भाइयों में सबसे बड़े रमेश कंपनी के प्रबंध निदेशक हैं। सभी भाई स्वरूप नगर में संयुक्त रूप से रहते हैं।
मोहिनी चाय कंपनी के मालिक