गन्ने की प्रजाति सीओ जीरो 238 (करन चार) यूपी के लिए वरदान साबित हो रही है। उम्मीद है कि इस प्रजाति की बदौलत जल्द ही यूपी चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र को पीछे छोड़ देगा। मौजूदा समय में यूपी चीनी उत्पादन में दूसरे स्थान पर है जबकि गन्ना पैदावार में पहले स्थान पर। यही नहीं इस प्रजाति ने चीनी मिलों और किसानों को मालामाल किया है।
पिछले वर्ष 26 हजार करोड़ रुपये का कारोबार किया गया। राष्ट्रीय शर्करा संस्थान में शनिवार को चीनी क्षेत्र में जैव अर्थव्यवस्था में उभरते अवसर एवं चुनौतियां विषय पर आयोजित एक दिवसीय सिंपोजियम में यह जानकारी शुगरकेन ब्रीडिंग अनुसंधान संस्थान कोयंबटूर के निदेशक बक्शीराम ने दी।
उन्होंने बताया कि 2013 से ‘करन चार’ प्रजाति का इस्तेमाल यूपी के गन्ना किसान कर रहे हैं। तीन साल से लगातार खेती का रकबा बढ़ता जा रहा है। 2015-16 में कुल बुआई क्षेत्र के 20 फीसदी हिस्से में इस प्रजाति के बीजों की बुआई की गई। इसकी खासियत बढ़िया पैदावार है। इसके एक टन गन्ने से 111-13 किलो चीनी उत्पादित होती है। स्प्रे इंजीनियरिंग डिवाइस लिमिटेड के एमडी विवेक वर्मा ने बताया कि अब नई तकनीक से एक बार हीट से पैदा स्टीम को 15 बार तक प्रयोग कर सकते हैं।
पहले इसे एक या दो बार इस्तेमाल कर सकते थे। दुबई स्थित विश्व के सबसे बड़े शुगर रिफाइनरी प्लांट अल खलीज रिफाइनरी में भी इसी तकनीक का प्रयोग होता है। इस तकनीक के प्रयोग से चीनी मिलों में बिजली की खपत को 20-30 फीसदी तक कम होने का साथ प्रदूषण भी कम होता है।
कार्यक्रम में गन्ने की कई प्रजातियों के जनक बक्शीराम को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया गया। इस मौके पर एनएसआई के निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन, शुगर नॉलेज टेक्नोलॉजी इंटरनेशनल लिमिटेड यूके के मैल्कम टॉफेर, इंटरनेशनल शुगर जरनल यूके के एडिटर ए छुदासामा, क्वीन्सलैंड यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी आस्ट्रेलिया के रिसर्च फेला डा. जान झांग, ऑडोबॉन शुगर इंस्टीट्यूट, यूनिवर्सिटी आफ लुसियाना, अमेरिका के पूर्व प्रोफेसर माइक ल सास्का, ग्लोबल केन शुगर प्राइवेट लिमिटेड के जीएससी राव ने भी विचार रखे। यहां पर डा. संतोष कुमार, डा. सीमा परौहा, डी स्वेन आदि मौजूद रहे।
12 साल लगते हैं एक प्रजाति तैयार करने में
डा. बक्शीराम ने बताया कि गन्ना कि एक प्रजाति विकसित करने में 12 साल लगते हैं। छह साल तक संबंधित सेंटर पर उसके तमाम प्रशिक्षण होते हैं। इसके बाद एआईसीआरवी के 10 सेंटरों पर अगले छह साल तक विभिन्न टेस्ट होते हैं। इसके बाद नई प्रजाति के बीज किसानों को दिए जाते हैं। वहीं उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र, कर्नाटक के लिए 20 ऐसे बीज तैयार कर लिए गए हैं जो सूखा पड़ने पर भी बोए जा सकते हैं।