दादा मियां की खानकाह में हुआ था मुशायरा
बेकनगंज स्थित हजरत दादा मियां की खानकाह के सज्जादानशीं सैयद अबुल बरकात नजमी ने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस की शाम खानकाह में मुशायरे का आयोजन किया गया था। दिन में लोग तिरंगा हाथ में लिए बधाई देने हर हाते में गए और गणतंत्र के बारे में बताया। इनमें बहुत से लोग ऐसे थे, जिन्होंने अपने प्यारों और दुलारों की आजादी के जंग में कु र्बानी दी थी। उस वक्त उनकी उम्र 12 साल की रही होगी, लेकिन बहुत सी बातें याद हैं। लोगों के पास वाहन नहीं थे। पैदल ही मिलने जा रहे थे। शाम को खानकाह में मुशायरा हुआ। उसमें मशहूर शायर असर लखनवी आए। मौलाना हसरत मोहानी को भी आना था लेकिन वह अलीगढ़ मुस्लिम विवि वायवा लेने गए थे। उस वक्त मेरे पिता खानकाह के सज्जादानशीं सैयद अबू मोहम्मद साकिब कानपुरी का यह शेर ‘जान देता हूं ‘कफस में दोनों पर खोले हुए, हसरत-ए-परवाज में भी शान है परवाज की’ बड़ा पसंद किया गया था।
ख्वाबों को पंख लगे, ऊंची उड़ान भरी
आईएमए के पूर्व अध्यक्ष सीनियर फिजीशियन डॉ. संतोष कुमार का कहना है कि पहले गणतंत्र दिवस पर लोगों की उम्मीदों को पंख लगे थे। ब्रितानी हुकूमत का दंश झेलने के बाद लोग अपने को संभाल रहे थे। तब काकादेव और आसपास का इलाका बसा नहीं था। गरीबी बहुत थी, लेकिन लोग खुश थे कि अपना देश, अपने संविधान से चलाया जाएगा। हर तरफ विकास होगा और उनके दिन बहुरेंगे। गरीब, अमीर सभी ने घरों के अंदर-बाहर दीप जलाए थे। उत्सव जैसा माहौल था। घरों में महिलाओं ने उत्सव गीत गाए थे। इसके अलावा लोग एक-दूसरे के घर गणतंत्र की बधाई देने भी गए थे।