कानपुर की बाजार में बिकते छाते
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30 मिनट में तैयार होता है एक छाता
यतीमखाना और खपरा मोहाल के आसपास छातों के कारखाने बचे हैं। यहां के बने छाते पूरे प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश और बिहार तक जाते हैं। 30 मिनट में एक छाता तैयार होता है। पहले सूती कपड़ों, लकड़ी और लोहे की तीलियों से छाता तैयार होता था। अब लोहा, प्लास्टिक का इस्तेमाल अधिक होता है। कपड़े के स्थान पर पीवीसी, सॉटन, नायलॉन, पालीस्टर के अलावा चीन से आयातित कपड़ों को लगाया जाता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ गई है।
कडक़ धूप में छाता लगाकर जातीं छात्राएं
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शहर में कम बरसात ने इस कारोबार को समेट दिया। दो दशक पहले तक शहर में बहुत अच्छी बरसात होती थी, जिससे छातों की मांग होती थी। अब एक दिन बरसात होती है और चार दिन धूप रहती है। बारिश का चक्र कम हो गया है। इसका व्यापार पर असर पड़ा। साथ ही लोहा, प्लास्टिक और कपड़ा महंगा होने से उत्पादन लागत 40-50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। -संजीव खन्ना, छाता कारोबारी
गर्मी व धूप से बचने के लिए छाता लगाकर जाती छात्राएं
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पहले मिलों में काम करने वाले श्रमिक के अलावा किसान छातों के बड़े खरीदार थे। शहर में मिलें खत्म हो चुकी हैं। स्कूली बच्चों के सहारे छातों और रेनकोट का कारोबार चल रहा है। छोटे बच्चों के छाते चीन से भी आते हैं। छाता और रेनकोट का कारोबार घटता जा रहा है। -राजीव मेहरा, छाता-रेनकोट व्यापारी
गर्मी से बचाव के लिए छाता लेकर जाती युवतियां
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जीएसटी लगने से पहले इस पर कोई टैक्स नहीं था। अब 12 प्रतिशत कर लगता है। यह आम व्यक्ति से जुड़ा उत्पाद है, जिस पर लग्जरी उत्पाद वाला कर है, जिससे छातों का व्यापार सिमट गया है। रेनकोट की शहर में ट्रेडिंग की जाती है, जो दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से आते हैं। -सुशील वर्मा, छाता-रेनकोट व्यापारी