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Kanpur: कम बारिश में डूब गया छातों का कारोबार, कारोबारी बोले- उत्पादन लागत बढ़ी…जीएसटी लगने से हुआ महंगा

Tue, 22 Jul 2025 01:51 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: छाता कारोबारियों को कहना है कि शहर में कम बरसात ने इस कारोबार को समेट दिया। दो दशक पहले तक शहर में बहुत अच्छी बरसात होती थी, जिससे छातों की मांग होती थी। अब एक दिन बरसात होती है और चार दिन धूप रहती है।
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कानपुर में रोड साइड बिकते छाते - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कानपुर में दो दशक से लगातार कम हो रही बारिश से बिसाती बाजार, यतीमखाना और खपरा मोहाल का छाता कारोबार धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है। 10 से 15 साल पहले यहां आठ से 10 छाता बनाने के कारखाने थे, जो अब दो या तीन ही बचे हैं। ऊपर से सरकार ने जीएसटी लागू करने के साथ ही 12 फीसदी टैक्स लगा दिया है, जबकि पहले कोई कर नहीं लगता था। अब स्कूली बच्चों के सहारे यह कारोबार चल रहा है।

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शहर के मेस्टन रोड में छाता और रेनकोट का थोक बाजार है, जहां 10-15 थोक कारोबारी हैं। विजयनगर चौराहा के पास पन्नी का थोक बाजार है। बिरहाना रोड में कपड़ों के तिरपाल का काम होता है। गुमटी नंबर पांच, सीसामऊ, गोविंदनगर, चावला मार्केट की दुकानों में फुटकर छाता और रेनकोट की बिक्री होती है। रेनकोट की शहर में केवल खरीद-बिक्री होती है। व्यापारी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता से इन्हें मंगवाते हैं।

कानपुर की बाजार में बिकते छाते - फोटो : amar ujala

30 मिनट में तैयार होता है एक छाता
यतीमखाना और खपरा मोहाल के आसपास छातों के कारखाने बचे हैं। यहां के बने छाते पूरे प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश और बिहार तक जाते हैं। 30 मिनट में एक छाता तैयार होता है। पहले सूती कपड़ों, लकड़ी और लोहे की तीलियों से छाता तैयार होता था। अब लोहा, प्लास्टिक का इस्तेमाल अधिक होता है। कपड़े के स्थान पर पीवीसी, सॉटन, नायलॉन, पालीस्टर के अलावा चीन से आयातित कपड़ों को लगाया जाता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ गई है।

कडक़ धूप में छाता लगाकर जातीं छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
शहर में कम बरसात ने इस कारोबार को समेट दिया। दो दशक पहले तक शहर में बहुत अच्छी बरसात होती थी, जिससे छातों की मांग होती थी। अब एक दिन बरसात होती है और चार दिन धूप रहती है। बारिश का चक्र कम हो गया है। इसका व्यापार पर असर पड़ा। साथ ही लोहा, प्लास्टिक और कपड़ा महंगा होने से उत्पादन लागत 40-50 प्रतिशत तक बढ़ गई है। -संजीव खन्ना, छाता कारोबारी

गर्मी व धूप से बचने के लिए छाता लगाकर जाती छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
पहले मिलों में काम करने वाले श्रमिक के अलावा किसान छातों के बड़े खरीदार थे। शहर में मिलें खत्म हो चुकी हैं। स्कूली बच्चों के सहारे छातों और रेनकोट का कारोबार चल रहा है। छोटे बच्चों के छाते चीन से भी आते हैं। छाता और रेनकोट का कारोबार घटता जा रहा है।  -राजीव मेहरा, छाता-रेनकोट व्यापारी
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गर्मी से बचाव के लिए छाता लेकर जाती युवतियां - फोटो : amar ujala
जीएसटी लगने से पहले इस पर कोई टैक्स नहीं था। अब 12 प्रतिशत कर लगता है। यह आम व्यक्ति से जुड़ा उत्पाद है, जिस पर लग्जरी उत्पाद वाला कर है, जिससे छातों का व्यापार सिमट गया है। रेनकोट की शहर में ट्रेडिंग की जाती है, जो  दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से आते हैं।  -सुशील वर्मा, छाता-रेनकोट व्यापारी
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