Kanpur News: लगातार हाे रही जीएसटी की निगरानी का असर पान मसाला कारोबार पर दिखने लगा है। पान मसाला का उत्पादन धड़ाम तो हुआ ही है साथ ही कत्था, लौंग-इलायची का कारोबार सिमटकर 30-40 प्रतिशत पर पहुंच गया।
पान मसाला कारोबार पर बीते तीन महीने से की जा रही निगरानी से इससे जुड़े उत्पादों के कारोबार पर बड़ा असर पड़ा है। पान मसाला इकाइयों में उत्पादन घटकर 30 प्रतिशत पर आ गया है। इससे सुपाड़ी कारोबार तो 90 प्रतिशत गिर गया है। कत्था, लौंग, इलायची, पिपरमेंट, जड़ी-बूटी, गरी, अलग-अलग प्रकार के सुगंध का व्यापार सिमटकर 30-40 प्रतिशत ही रह गया है। उत्पादन घटने से कर्मचारियों और श्रमिकों को 15 दिन की छुट्टी दे दी गई है।
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प्रमुख सचिव के निर्देश पर एसजीएसटी के अधिकारी तीन महीने से पान मसाला कारोबार की निगरानी कर रहे हैं। इसके चलते सुपाड़ी, कत्था, चूना, लौंग, इलायची, मुलेठी, पिपरमेंट के कारोबार को तगड़ा झटका लगा है। पहले सामान्य दिनों में शहर में 1000 से 1200 बोरी सुपाड़ी की खपत होती थी जो अब 50 बोरी ही रह गई है। एक बोरी में 50 किलो सुपाड़ी होती है। महीने में औसतन चार से पांच करोड़ रुपये की सुपाड़ी की बिक्री होती थी,, अब 50 से 70 लाख रुपये की सुपाड़ी बिक रही है।
इसी तरह प्रतिदिन 50 सेे 100 पेटी कत्था का कारोबार होता था जो अब 20-25 पेटी ही रह गया है। एक पेटी में 20 किलो कत्था आता है। औसतन हर महीने दो से तीन करोड़ रुपये का कत्था बिकता था, अब 80 से 90 लाख रुपये तक का कत्था बिक रहा है। लौंग-इलायची की खपत सामान्य दिनों में 50-50 बोरी थी जो अब 10-15 बोरी ही रह गई है। इसके अलावा पान मसाला में अलग-अलग प्रकार के सुगंध का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी खपत भी 25-30 प्रतिशत ही रह गई है। इसके अलावा पैकेजिंग कारोबार पर भी तगड़ा असर पड़ रहा है। सरकार को पान मसाला इकाइयों से सालाना करीब एक हजार करोड़ का राजस्व मिलता है। निगरानी से डरी इकाइयों ने स्थानीय स्तर पर उत्पादन घटाकर बाहर राज्यों से उत्पादन तेज कर दिया है। जानकारों का कहना है कि निगरानी केवल कानपुर समेत उत्तर प्रदेश की पान मसाला इकाइयों में की जा रही है। इस तरह से तो अगले कुछ महीने में इस ट्रेड का उत्पादन शहर व आसपास जिलों से खत्म हो जाएगा।
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14 इकाइयां हैं शहर में, रोस्टर के अनुसार हो रही निगरानी
पान मसाला फैक्टि्रयों के बाहर एसजीएसटी के अफसरों की रोस्टर के अनुसार पिछले साल अक्तूबर महीने से ड्यूटी लगाई जा रही है। निगरानी हफ्ते दर हफ्ते बढ़ाई जा रही है। अब 38 टीमें निगरानी कर रही हैं। पहले इनकी संख्या 28 थी। कानपुर नगर, कानपुर देहात में बड़े पैमाने पर पान मसाला, गुटखा, खैनी और तंबाकू का उत्पादन किया जाता है। यहां पर 14 इकाइयां हैं। इसके अलावा लखनऊ, नोएडा, दिल्ली से तैयार माल शहर में आता है। सूत्रों ने बताया कि शुक्रवार को शासन स्तर में बैठक के दौरान एक महिला अधिकारी ने बताया कि एक पान मसाला इकाई के संचालक से कैमरे लगवाने के लिए कहा गया तो उन्होंने कैमरे लगवाने से मना कर दिया और साथ ही कहा कि यूनिट बंद कर देंगे।
तीन ब्रांडों का रीवा, गुवाहाटी और हरियाणा की ओर रुख
शहर में एसएनके, गगन, सर, रायल, मधु, शिखर, केसर, सिग्नेचर शुद्ध प्लस, तिरंगा, किसान ब्रांड के पान मसाला का उत्पादन किया जाता है। पान मसाला कारोबार में कर चोरी रोकने के लिए पहले से ही ऑनलाइन निगरानी हो रही है। सूत्रों ने बताया कि बढ़ती निगरानी से कारोबारी परेशान हैं। इनमें से तीन ब्रांडाें ने रीवा, गुवाहाटी और हरियाणा की ओर रुख शुरू कर दिया है। शहर से काम समेटने की शुरुआत कर दी गई है। अब कर्मचारियों और श्रमिकों को महीने में 15 दिन बुलाकर 15 दिन का ही भुगतान हो रहा है।
एक ट्रेड को बनाया जा रहा लक्ष्य
शासन की मंशा क्या है। एक ट्रेड विशेष को अधिकारी लक्ष्य बनाकर काम कर रहे हैं। कारोबारी अपनी बात रखने लखनऊ भी जा चुके हैं लेकिन कोई असर ही नहीं दिख रहा है। एक ओर सरकार कारोबार बढ़ाने की प्रतिबद्धता जाहिर करती है, दूसरी ओर कानपुर समेत उप्र से पान मसाला कारोबार खत्म करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जा रही है। तीन ब्रांडों ने अपने कारोबार को अलग-अलग राज्यों में ले जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। - अवधेश बाजपेई, अध्यक्ष, द किराना मर्चेंट एसोसिएशन
ऐसे तो शहर से खत्म हो जाएगा कारोबार
हालात ऐसे ही रहे तो पान मसाला और सुपाड़ी कारोबार शहर से खत्म हो जाएगा। इससे सरकार को सालाना करीब एक हजार करोड़ का राजस्व मिलता है। ऐसा तो आज तक किसी कारोबार की निगरानी में देखने को नहीं मिला है। जिस तरह से पान मसाला कारोबार को टारगेट करके निगरानी की जा रही है, उससे इस कारोबार से जुड़े सुपाड़ी, कत्था, लौंग, इलायची, पिपरमेंट, जड़ी-बूटी, गरी आदि के कारोबार पर गहरा प्रभाव पड़ चुका है। पान मसाला इकाइयों में उत्पादन केवल 30 प्रतिशत रह गया है। - अलंकार ओमर, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, द किराना मर्चेंट एसोसिएशन